नैयायिक-हमारे यहाँ प्रमाण, प्रमेय, संशय, प्रयोजन, दृष्टांत, सिद्धांत, अवयव, तर्क, निर्णय, वाद, जल्प, वितंडा, हेत्वाभास, छल, जाति और निग्रह स्थान ये सोलह पदार्थ हैं। इन पदार्थों में आत्मा, शरीर, इंद्रिय, अर्थ, बुद्धि, मन, प्रवृत्ति, दोष, प्रेत्यभाव, फल, दु:ख और अपवर्ग के भेद से बारह प्रकार का प्रमेय बन जाता है।
जैन-ऐसा नहीं मानना। यहाँ पर भी भेदैकांत में संबंध नहीं बनता है और इन्द्रिय, बुद्धि तथा मन की सामर्थ्य की उपलब्धि रूप साधन से प्रमेय नहीं हो सकता है तथा आत्मा प्रमाता है। प्रमाता, प्रमाण, प्रमेय और प्रमिति ये अंतर्भेद स्वीकार किये गये हैं।
संशय आदि को प्रमेय नहीं मानने पर व्यवस्था नहीं बन सकती। भेदैकांत पक्ष में संग्रह का विरोध है और प्रत्यक्ष आदि का अंतर्भाव हो भी नहीं सकता है इसलिए आपके द्वारा मान्य सोलह पदार्थ की व्यवस्था संभव नहीं है।
भावार्थ-यौग के दो भेद हैं-वैशेषिक और नैयायिक। प्राय: इनकी मान्यतायें मिलती जुलती हैं। इन दोनों ने अपने माने हुए पदार्थों में परस्पर में सर्वथा भेद माना है पुन: उनमें समवाय से संबंध माना है किन्तु यह कल्पना बिल्कुल गलत है।
जैसे-जीव का ज्ञान गुण जीव से बिल्कुल भिन्न है किन्तु समवाय से उसका संबंध हो रहा है। इस पर आचार्यों का कहना है कि भाई! जीव और ज्ञान पहले अलग-अलग दिखे, फिर उन्हें अलग मानकर उनका संबंध करना चाहिए किन्तु ज्ञान के बिना जीव का, उष्णगुण के बिना अग्नि का अस्तित्व ही नहीं रह सकता है इसलिए द्रव्यगुण आदि को भिन्न ही मानना नितांत गलत सिद्धांत है।