शंका-पक्ष में धर्म, सपक्ष में तत्त्व और विपक्ष से व्यावृत्ति ये तीन रूप हेतु के लक्षण हैं। पुन: आपके द्वारा मान्य अविनाभाव रूप एक लक्षण उसका नहीं बन सकता है ? अन्यथा असिद्ध, विरुद्ध और अनैकांतिक दोषों का निराकरण नहीं हो सकेगा ?
समाधान-ऐसा नहीं कहना, क्योंकि असाधारणस्वरूप ही लक्षण होता है। निश्चित ही ये तीन रूप असाधारण नहीं हैं। देखिये-‘वह श्याम है क्योंकि उसका पुत्र है’ इत्यादि हेत्वाभास में भी ये तीन रूप देखे जाते हैं। विवाद की कोटि में आये हुए उसके पुत्र में और अन्यत्र श्याम में ‘उस पुत्र होनारूप’ हेतु पाया जाता है और कहीं अश्याम में उसके पुत्रत्व का अभाव है।
बौद्ध-यहाँ पर विपक्ष से व्यावृत्ति होने रूप नियम का अभाव है अत: यह हेतु के लक्षण नहीं हैं।
जैन-ऐसा नहीं कहना। क्योंकि वही अविनाभाव उस हेतु का लक्षण हो जावे, पुन: अन्य ‘अंतर्गडु’ से (व्यर्थ के अंतर्विकल्पों से) क्या प्रयोजन है ? उसी को कहा भी है-
‘अन्यथानुपपन्नत्वं यत्र तत्र त्रयेण किम्’ जहां अन्यथानुपपत्ति-अन्य प्रकार से न होना यह अविनाभाव मौजूद है वहाँ इन तीनों से क्या प्रयोजन है ?
इसी कथन से ‘असत्प्रतिपक्षत्व और अबाधित विषयत्व उस हेतु के लक्षण हैं, इस मान्यता का भी खंडन हो गया है क्योंकि अविनाभाव के अभाव में ये लक्षण साध्य के गमक-बतलाने वाले नहीं हैं।
भावार्थ-बौद्ध ने हेतु के तीन रूप माने हैं-पक्षधर्मत्व, सपक्षसत्त्व और विपक्ष व्यावृत्ति। आचार्य ने कहा कि हेतु में यदि ये तीन रूप हैं भी और अविनाभाव नहीं है तो वह हेतु अपने साध्य को सिद्ध नहीं कर सकेगा। यदि अविनाभाव है और रूप नहीं है फिर भी वह साध्य को सिद्ध कर देगा। उसी प्रकार नैयायिक हेतु के इन्हीं तीन रूपों में असत्प्रतिपक्षत्व और अबाधित विषयत्व ये दो रूप और जोड़कर हेतु के पाँच रूप मानते हैं किन्तु इनके खंडन में भी यही बात है कि जब इन पाँचों के होने पर भी अविनाभाव के बिना हेतु गमक नहीं होता है और अविनाभाव लक्षण के होने पर ये हों चाहे न हों, हेतु साध्य को सिद्ध कर देता है। तब इन पाँचों के मानने से कोई प्रयोजन नहीं है।