अर्थ-नमस्कार करते हुए देवों के मुकुट से स्पर्शित है चरण नख किरणें जिनकी, ऐसे हृदय के अंधकार को ध्वंस करने में प्रशंसित जिन चंद्रमा को मेरा नमस्कार होवे।।१।।
उत्थानिका-अब इस समय प्रमाण और प्रमाणाभास की परीक्षा करके नय और नयाभास के लक्षण की परीक्षा के लिए कहते हैं-
अन्वयार्थ-(भेदाभेदात्मके ज्ञेये) भेदाभेदात्मक ज्ञेय पदार्थ में (भेदाभेदाभिसंधय:) जो भेद और अभेदरूप अभिप्राय हैं (एते) ये (अपेक्षानपेक्षाभ्यां) अपेक्षा और अनपेक्षा के द्वारा (नयदुर्नया:) नय और दुर्नयरूप (लक्ष्यंते) निश्चित किये जाते हैं।।१।।
अर्थ-भेदाभेदात्मक ज्ञेय पदार्थ में भेद और अभेदरूप अभिप्राय को नय कहते हैं। ये अपेक्षा और अनपेक्षा के द्वारा नय और दुर्नय रूप से निश्चित किये जाते हैं।।१।।
तात्पर्यवृत्ति-प्रतिपक्ष धर्म की आकांक्षारूप अपेक्षा से और इससे विपरीत सर्वथा एकांतरूप अनपेक्षा से ये नय और नयाभास लक्षित-निश्चित किये जाते हैं।
प्रश्न-ये किन विशेषताओं से सहित हैं ?
उत्तर-ये भेद और अभेद के अभिप्राय रूप हैं। विशेष, पर्याय और व्यतिरेक को भेद कहते हैं। सामान्य, एकत्व और सादृश्य को अभेद कहते हैं। इन भेद और अभेद के अभिप्राय रूप हैं अर्थात् ये नय श्रुतज्ञानी के विकल्प रूप हैं। भेदाभेदात्मक जीवादि ज्ञेय-प्रमेय के जानने में ये भेदाभेद विकल्प होते हैं।
निश्चित ही एकांतरूप से भेदात्मक अथवा अभेदात्मकरूप प्रमेय उपलब्ध नहीं है। अनुवृत-व्यावृत्त प्रत्यय के बल से उभयात्मक ही उपलब्ध हो रहा है क्योंकि प्रमाण अनेकांत को विषय करने वाला है। ‘अनेकांत: प्रमाणात्१’ अनेकांत प्रमाण से जाना जाता हैै।