तात्पर्यवृत्ति-कार्यरूप उत्तर परिणाम का स्वरूप लाभ होना कार्य की उत्पत्ति है। स्वयं कारण-कार्य उत्पन्न करने वाला द्रव्य का स्वरूप उपादान है। उसे स्वयं कारण कहते हैं और उसका अस्तित्व स्वयं कारण सत्ता है। यदि स्वयं द्रव्य स्वरूप उपादान की सत्ता से कार्य की उत्पत्ति विरुद्ध होवे तब क्षणिक अर्थ में अर्थक्रिया के संभव का अनुमान हो सके।
अर्थ-अभिमत प्रयोजन की क्रिया-निष्पत्ति अर्थक्रिया है, उसका संभवसाधन-‘नित्यक्रम यौगपद्य विरहात्’ नित्य में क्रम और युगपत् का अभाव है’ इत्यादि अनुमान है। निरन्तर विनश्वर को क्षणिक कहते हैं अर्थात् क्षणिक-विनश्वर पदार्थ में वह अर्थक्रिया संभव नहीं है।
तथा वह कार्य की उत्पत्ति विरुद्ध नहीं है क्योंकि कार्य के समय सत् रूप ही कारण होता है अन्यथा कार्य को आकस्मिकपने का प्रसंग आ जाएगा और क्षणिवैâकांत में कार्य-कारणभाव का विरोध है। जिसके अभाव में जो उत्पन्न होता है और जिसके सद्भाव में जो उत्पन्न नहीं होता है, उनमें कार्य-कारण भाव नहीं है अन्यथा अतिप्रसंग दोष आ जायेगा। इस हेतु से कथंचित् सत् को ही कारण अथवा कार्य स्वीकार कर लेना चाहिए। इस प्रकार वस्तु द्रव्य पर्यायात्मक ही है, क्योंकि उसी में अर्थक्रिया संभव है।
भावार्थ-बौद्ध का कहना है कि कारण रूप मृत्पिंड का सर्वथा निमूल चूल नाश होकर घटरूप कार्य बनता है। इस पर आचार्यों का कहना है कि स्वयं उपादान कारणरूप मृत्पिंड ही घट कार्य रूप से परिणत होता है, ऐसा स्पष्ट प्रतीत हो रहा है अतएव सर्वथा क्षणिक सिद्धांत में कार्य-कारण भाव सिद्ध नहीं होता है और न उस क्षणिक वस्तु में इष्ट प्रयोजन के होने रूप अर्थक्रिया ही संभव है अत: वस्तु कथंचित् नित्यानित्यात्मक स्वीकार करना चाहिए।
उत्थानिका-एक ही अनेक कार्य को करने वाला और धर्मों में व्याप्त होकर रहने वाला वैâसे हो सकता है क्योंकि परस्पर में विरोध है ? इस आशंका का निराकरण करते हुए कहते हैं-
अन्वयार्थ-(यथा एकं) जैसे एक-क्षणिक स्वलक्षण (सकृत्) एक क्षण में (भिन्नदेशार्थान्) भिन्न देश वाले कार्यों को (कुर्यात्) करता है (वा) अथवा (व्याप्नोति) व्याप्त करता है (तथा) वैसे ही (एकं) एक द्रव्य (क्रमात्) क्रम से (भिन्न कालार्थान्) भिन्न कालवर्ती कार्यों को (कुर्यात्) करता है (वा व्याप्नोति) अथवा उनको व्याप्त करता है।।७।।
अर्थ-जिस प्रकार एक (क्षणिक स्वलक्षण) सकृत्-एकक्षण में भिन्न-विप्रकृष्ट देश वाले कार्यों को उत्पन्न करता है अथवा जैसे एक ही (ज्ञान) भिन्न देश वाले अर्थों को व्याप्त करता है। वैसे ही एक (अभिन्न द्रव्य) क्रम से भिन्न कालवर्ती कार्यों को करता है अथवा उनको व्याप्त करता है।।७।।
तात्पर्यवृत्ति-जिस अविरोध प्रकार से एक सौगत के द्वारा स्वीकृत क्षणिक स्वलक्षण एक क्षण में भिन्न-विप्रकृष्ट देश वाले कार्यों को ‘स्वसंतानवर्ती को उपादानरूप से और भिन्न संतानवर्ती को निमित्त रूप से उत्पन्न करता है। अथवा जैसे एक ही ज्ञान भिन्न देशार्थ अर्थात् विप्रकृष्ट नीलादि आकारों को व्याप्त करता है इसमें विरोध नहीं है। वैसे ही एक अभिन्न द्रव्य क्रम से काल भेद से पूर्व और अपर काल में होने वाले कार्यों को करता है, पूर्वाकार का परिहार, उत्तर आकार की प्राप्ति और स्थितिरूप से परिणमन करता है अथवा उन्हीं को व्याप्त करता है-उनके साथ तादात्म्य का अनुभव करता है, यह बात विरुद्ध नहीं है।
एक के ही नाना देश के कार्यों को करना अविरुद्ध है किन्तु नाना काल के कार्य को करना विरुद्ध है। यह कथन भी अपने दर्शन का अनुराग मात्र ही है क्योंकि न्याय तो सर्वत्र समान होता है इसलिए जीवादि वस्तु एकानेकादि रूप से अनेकांतात्मक सिद्ध हैं अन्यथा अर्थक्रिया का विरोध हो जावेगा।
भावार्थ-बौद्ध का कहना है कि एक क्षणिक स्वलक्षण भिन्न देशवर्ती कार्यों को उत्पन्न करता है और एक निरंश ज्ञान भिन्न देशवर्ती नीलादि आकारों में व्याप्त होता है किन्तु आचार्य कहते हैं कि वैसे ही सत् रूप से अभिन्न एक द्रव्य पूर्वोत्तर कालवर्ती कार्यों को करता है और उन्हीं को व्याप्त करके उन्हीं में तादात्म्य का अनुभव भी करता है अत: एक अनेक कार्य को नहीं कर सकता या अनेक धर्मों में व्याप्त नहीं रह सकता है ऐसा दोष कहाँ रहा ? भाई, न्याय तो दोनों जगह समान ही रहेगा।
उत्थानिका-इस प्रकार सत्सामान्य रूप पर द्रव्य को और उत्पाद, व्यय, ध्रौव्य से युक्त अपर द्रव्य को प्रतिपादित करके उसमें पर द्रव्य को विषय करने वाले परसंग्रह को और तदाभास को दिखलाते हुए कहते हैं-
अन्वयार्थ-(संग्रह:) संग्रह नय (सदात्मना) सत्रूप से (सर्वभेदैक्यं) सभी भेदों में ऐक्य को (अभिप्रैति) स्वीकार करता है किन्तु (ब्रह्मवाद:) ब्रह्माद्वैतवाद (तदाभास:) संग्रहाभास है (स्वार्थ भेदनिराकृते:) क्योंकि वह अपने और अर्थ के भेदों का निराकरण करता है।।८।।
अर्थ-संग्रहनय सत्रूप से सभी भेदों में ऐक्य को स्वीकार करता है। अपने अर्थ के भेद का निराकरण करने से ब्रह्माद्वैतवाद संग्रहाभास है।।८।।
तात्पर्यवृत्ति-संग्रहनय सभी भेदरूप द्रव्यादि के ऐक्य-अभेद को ‘सर्वं सत्-सभी सत्रूप हैं’ इस सत्रूप से विषय करता है। ‘सत्सामान्यात्तु सर्वैक्यं१’ सत्सामान्य से सभी में ऐक्य-अभेद है’ ऐसा श्री समंतभद्रस्वामी का वचन है। सर्वथा सभी वस्तु एक रूप नहीं है क्योंकि वैसी प्रतीति नहीं होती है।
शंका-इस प्रकार से तो आपने ब्रह्मवाद का ही समर्थन कर दिया है ?
समाधान-नहीं। वह सत्ता द्वैतरूप भ्ाावैकांत ही ब्रह्मवाद है अत: वह संग्रहाभास है।
शंका-क्यों ?
समाधान-क्योंकि वह अपने ब्रह्मवाद विषय के भेदों का निराकरण करने वाला है। स्व-अपने ब्रह्मवाद का अर्थ-विषय, सन्मात्र, उसके भेद-जीवादि विशेषों का निराकरण-निषेध करने वाला है। निश्चित ही सर्वथा सत्रूप में भेदों को अवकाश नहीं है और भेद रहित वह सामान्य वैâसे रह सकता है क्योंकि निराश्रय रूप है और अर्थक्रिया से रहित है। नैकं२ स्वस्मात् प्रजायते-’ एक ही ब्रह्म अपने आप से उत्पन्न नहीं हो सकता है’ ऐसा न्याय है। उस ब्रह्माद्वैत में क्रिया कारक का भेद भी नहीं है कि जिससे अर्थक्रिया संभव हो सके अर्थात् नहीं हो सकती है।
भावार्थ-ब्रह्माद्वैतवादी का कहना है कि सभी चेतन-अचेतन रूप जगत् सत्रूप है वह सन्मात्र शरीरधारी परम ब्रह्म ही है।
उत्थानिका-अब इस समय नैगमनय और तदाभास का निरूपण करते हैं-
अन्वयार्थ-(अन्योन्यगुणभूतैकभेदाभेद प्ररूपणात्) परस्पर में गौणभूत और प्रधानभूत भेद तथा अभेद का प्ररूपण करने से (नैगम:) नैगमनय है। (अर्थांतरोक्तौ) और द्रव्य से गुणादि को भिन्न कहने पर (नैगमाभास:) नैगमाभास (इष्यते) माना जाता है।।९।।
अर्थ-परस्पर में गौणभूत और एक-प्रधानभूत भेद और अभेद का प्ररूपण करने वाला नैगम नय है और अर्थांतर को करने में-द्रव्य से गुणादि को भिन्न कहने में वह नैगमाभास माना जाता है अर्थात् द्रव्य से गुणादि के भेद-अभेद को कथंचित् मुख्य गौण से कहने से नैगमनय होता है और सर्वथा भेद को कहने से नैगमाभास हो जाता है।।९।।
तात्पर्यवृत्ति-निगम-मुख्य गौण कल्पना, उसमें होने वाला नय ‘‘नैगम’’ कहलाता है, ऐसा स्याद्वादियों ने स्वीकार किया है। अन्योन्य-परस्पर में गुणभूत-अप्रधानभूत और एक-प्रधानभूत भेद-अभेद का प्ररूपण करता है अर्थात् गुण-गुणी में, अवयव-अवयवी में, क्रिया-कारकों में और सामान्य-सामान्यवान् में कथंचित् भेद को गौण करके अभेद का प्ररूपण करता है अथवा अभेद को गौण करके भेद को प्ररूपित करता है, यह नैगमनय इस प्रकार का है। प्रमाण में भेद और अभेद का अनेकांत ग्रहण होता है।
शंका-गुण-गुणी आदि में अत्यंत भेद ही है ?
समाधान-गुण और गुणी में अर्थांतर-अत्यंत भेद प्ररूपित करने पर तो वह नैगमाभास माना जावेगा क्योंकि वह अत्यंत भेद प्रमाण से बाधित है। निश्चित ही द्रव्य से अत्यन्त भिन्न गुण आदि प्रतीति में नहीं आते हैं क्योंकि द्रव्य से गुणादि का अशक्य विवेचन होने से उनमें तादात्म्य प्रतीत हो रहा है और उन्हें अत्यन्त भिन्न मानने पर उनमें संबंध का अभाव है।
भावार्थ-वैशेषिक का कहना है कि अग्नि द्रव्य से उष्ण गुण सर्वथा भिन्न है, वस्त्र के सूतरूप अवयवों से वस्त्र अवयवी भी भिन्न है, सत् सामान्य से सत्सामान्य वाली वस्तु भी भिन्न है किन्तु आचार्यों का कहना है कि इस प्रकार से द्रव्यादि से गुणादि का अलग अस्तित्व प्रतीत नहीं हो रहा है इसलिए द्रव्य से गुणादि को भिन्न कहने में वह नैगमनय नहीं रहकर नैगमाभास हो जाता है।
उत्थानिका-गुण-गुणी आदि में समवाय संबंध है ही है इस प्रकार के यौगमत का निराकरण करते हुए कहते हैं-
अन्वयार्थ-(सत्तावत् अर्था: स्वत: संतु) सत्ता के समान पदार्थ स्वत: विद्यमान होवें, पुन: (सदात्मनां सत्तया किं) सत्रूप पदार्थों में सत्ता से क्या प्रयोजन है ? (असदात्मसु एषा न स्यात्) असत् रूप पदार्थों में भी वह सत्ता नहीं हो सकती है (सर्वथा अतिप्रसंगत:) सब प्रकार से अतिप्रसंग दोष आता है।।१०।।
अर्थ-सत्ता के समान पदार्थ स्वत: विद्यमान होवें, पुन: सत्स्वरूप पदार्थों में सत्ता से क्या प्रयोजन है ? यदि वे सर्वथा असत्स्वरूप हैं तो उनमें भी यह सत्ता नहीं हो सकती है अन्यथा अतिप्रसंग दोष आ जाता है।।१०।।
तात्पर्यवृत्ति-यौगमत में स्वत: सत् स्वरूप पदार्थों में सत्ता समवाय होता है या असत् स्वरूप पदार्थों में सत्ता समवाय है ? इस प्रकार के दो विकल्प को मन में रखकर प्रथम पक्ष में दूषण देते हैं-
स्वत: स्वरूप से सत्तावत् पदार्थ होवें अर्थात् जैसे सत्तांतर के बिना भी सत्ता-परसामान्य स्वत: ही है, उसी प्रकार द्रव्यादि भी स्वत: ही होवें और उस प्रकार से स्वत: सत् स्वरूप के सत्ता से क्या प्रयोजन है? अर्थात् कुछ भी प्रयोजन नहीं है यह अर्थ हुआ क्योंकि उस सत्ता के बिना भी उन पदार्थों का सत्त्व है।
अब द्वितीय विकल्प को दूषित करते हुए कहते हैं-
सर्वथा असत् स्वरूप द्रव्यादिकों में अन्य कोई सत्ता है नहीं अन्यथा अतिप्रसंग आ जावेगा। सर्वथा असत् रूप खर, विषाण आदि में भी सत्ता समवाय हो जाना चाहिए।
एवं द्रव्यत्वादि समवाय का भी इसी प्रक्रिया से विचार करना चाहिए अर्थात् प्रश्न यह उठता है कि द्रव्य में स्वत: द्रव्यत्व है या नहीं ? यदि द्रव्य में स्वत: द्रव्यत्व है तो द्रव्यत्व का समवाय अनर्थक है और यदि नहीं है अर्थात् वह द्रव्य अद्रव्य है तब तो उसमें अद्रव्य में द्रव्यत्व का समवाय मानने पर अतिप्रसंग दोष आ जाता है।
दूसरी बात यह है कि अवयवी अवयवों में एकदेश से रहता है या सर्वात्मदेश से रहता है ? यदि प्रथम पक्ष लो कि वह अवयवी अवयवों में एकदेश से रहता है तब तो उस अवयवी को जितने कि अवयव हैं उतने ही अंशों से होना चाहिए अन्यथा सभी अवयवों को एकत्व का प्रसंग आ जावेगा। यहाँ पर भी रहना मानने पर तो फिर उस अवयवी के उतने ही अंश कल्पित करने पर अनवस्था हो जावेगी।यदि आप कहें कि अवयवी अवयवों में संपूर्ण रूप से रहता है तब तो अवयवी को बहुत मानना पड़ेगा अन्यथा रहने का विरोध हो जावेगा इसलिए उन गुण-गुणी आदि में कथंचित् तादात्म्य लक्षण समवाय स्वीकार करना चाहिए अन्य प्रकार से नहीं, यह बात व्यवस्थित हो गई।
विशेषार्थ-प्रत्येक वस्तु में कथंचित् तद्भाव लक्षण अभिन्न रूप एक संबंध दिख रहा है जैसे कि जीव का ज्ञान गुण जीव से अभिन्न है, तद्भावरूप है और अग्नि का उष्ण गुण भी अभिन्न है। इसे ही जैनों ने तादात्म्य लक्षण संबंध कहा है कि जिसको कभी भी वस्तु से अलग नहीं कर सकते हैं। यौग ने अकारण ही इस अभिन्न रूप अयुत लक्षण संबंध को समवाय नाम देकर पृथक् से सिद्ध करना चाहा था किन्तु जैनाचार्यों का कहना है कि कथंचित् तादात्म्य लक्षण संबंध को ही आप समवाय नाम दे दीजिए, कोई बाधा नहीं है।
उत्थानिका-ब्रह्मवाद और भेदवाद में भी प्रमाण आदि व्यवहार संभव हैं अत: वे संग्रहावास और नैगमाभास वैâसे हैं ? इस प्रकार के आक्षेप को समाप्त करते हुए कहते हैं-
अन्वयार्थ-(व्यवहारात् हि प्रामाण्यं) निश्चित रूप से व्यवहार से प्रमाणता होती है। (तयो:) इन ब्रह्मवाद और भेद में (स: तत्त्वत: न स्यात्) वह व्यवहार वास्तविक नहीं है। (वा) अथवा (मिथ्यैकांते) इस व्यवहार को एकांत से मिथ्या मानने पर (स्वपक्ष विपक्षयो:) स्वपक्ष और विपक्ष में (का विशेष:) क्या अंतर रहेगा ?।।११।।
अर्थ-व्यवहार से प्रमाणता है ऐसा कहने पर तो इन ब्रह्मवाद और भेदवाद में वह प्रमाणादि व्यवहार वास्तविक नहीं रहेगा, पुन: एकांत से वह व्यवहार मिथ्या है ऐसा मानने पर तो स्वपक्ष और परपक्ष में क्या अंतर रहेगा ? अर्थात् कुछ भी नहीं रहेगा।।११।।
तात्पर्यवृत्ति-अपने इष्ट के साधन और अनिष्ट के दूषण में निमित्तक प्रत्यक्ष अथवा अन्य-अनुमान आदि प्रमाण हैं, इस बात को सभी को स्वीकार करना चाहिए, अन्यथा अतिप्रसंग आ जावेगा और वह प्रमाण व्यवहार से उन दोनों में वास्तविक नहीं है अर्थात् विधिपूर्वक अवहरण-विभाग करना-भेद कल्पना करना व्यवहार कहलाता है। इस व्यवहार का आश्रय लेकर संग्रहाभास और नैगमाभास में प्रमाणता परमार्थ से नहीं है।निश्चित ही निरपेक्ष भावैकांत में प्रमाण आदि भेद व्यवहार नहीं है, इसका पहले निराकरण कर दिया है। भेदैकांत में भी प्रमाण और प्रमाण के फल का व्यवहार नहीं है क्योंकि उसमें संबंध का अभाव है।
प्रश्न-उनमें औपचारिक प्रमाण और फल का व्यवहार है ?
उत्तर-भेद एकांत के पक्ष में यदि आप प्रमाण और फल के व्यवहार को एकांत से अवास्तविक स्वीकार करते हैं तब तो स्वपक्ष और परपक्ष में क्या अंतर होगा ? अर्थात् कुछ भी अंतर नहीं होगा।
ब्रह्मवादी के पक्ष में ब्रह्मवाद स्वपक्ष है और क्षणिकवाद विपक्ष है। यौग के पक्ष में भेदवाद स्वपक्ष है और अद्वैतवाद विपक्ष है।
भेदैकांत में प्रमाण, फल आदि व्यवहार को मिथ्या मानने पर तो स्वपक्ष और परपक्ष में संकर का प्रसंग आ जावेगा इसलिए कथंचित् प्रमाणादि व्यवहार भी वास्तविक स्वीकार करना चाहिए।
विशेषार्थ-ब्रह्मवादी का कहना था कि हमारे यहाँ प्रमाणादि व्यवहार संभव हैं पुन: हमारे ब्रह्मवाद को विषय करने वाला नय संग्रहाभास वैâसे होगा ? ऐसे ही यौग ने कहा कि हमारे भेद पक्ष में भी प्रमाणादि व्यवहार होते हैं पुन: हमारे मत के पदार्थों को जानने वाला नय नैगमाभास वैâसे कहलाएगा ? आचार्यों ने कहा कि यह प्रमाण आदि का कथन व्यवहार मात्र से ही है अर्थात् कल्पित ही है किन्तु वास्तविक नहीं है, पुन: उस कल्पित मात्र प्रमाण आदि की व्यवस्था से स्वपक्ष और परपक्ष में अंतर सिद्ध करना असंभव हो जावेगा इसलिए प्रमाण आदि व्यवहार को आप कल्पित मत कहिए और वास्तविक प्रमाण आदि व्यवस्थाएँ जहाँ हैं वहाँ एकांत मान्यता को गुंजाइश नहीं है।
उत्थानिका-अब उनके सुनयत्व को प्रतिपादित करते हैं-
अन्वयार्थ-(बहि: अर्थ: अस्ति) ‘बाह्य पदार्थ है’ ऐसा (अविसंवादी व्यवहार:) अविसंवादी व्यवहार (नय:) स्यात् नय है। (अन्यथा) अन्य प्रकार से (विज्ञप्तिमात्र शून्यं) तत्त्व विज्ञानमात्र या शून्यमात्र है (इति ईदृश:) इस प्रकार ऐसा व्यवहार (दुर्नय:) दुर्नय है।।१२।।
अर्थ-‘बाह्य अर्थ है’ इस प्रकार से अविसंवादी व्यवहार वाले नय सुनय हैं और अन्यथा-अन्य प्रकार से ‘विज्ञानमात्र तथा शून्यमात्र तत्त्व है’ ऐसा कहने वाले नय दुर्नय कहे जाते हैं।।१२।।
भावार्थ-जो नय व्यवहार में विसंवादरहित है वे ही सुनय हैं जैसे-‘बाह्य पदार्थ हैं’ प्रत्युत् अनुसरण करते हैं और इनसे विपरीत जो नय ‘विज्ञान मात्र तत्व है’ इत्यादि एकांत को कहने वाले हैं वे व्यवहार की प्रतीति का अपलाप करने वाले होने से दुर्नय हैं।
तात्पर्यवृत्ति-‘बाह्य अर्थ है’ इस प्रकार ग्रहण करने वाले होने से संग्रह आदि नय साध्य-साधन भावस्वरूप प्रमाणीक हैं क्योंकि ये व्यवहार में अविसंवादी हैं। कारण-कार्यभाव आदि व्यवस्था को व्यवहार कहते हैं, इस व्यवहार में ये विसंवादरहित, अव्यभिचारी हैं। व्यवहार के सुनयरूप होने पर उस व्यवहार के आधीन कारण-कार्यभाव आदि की सिद्धि होती है, अन्यथा-व्यवहार में विसंवादी होने से वे दुर्नय हो जाते हैं।
प्रश्न-वैâसे दुर्नय होते हैं ?
उत्तर-विज्ञानमात्र ही तत्त्व है, अन्य कुछ नहीं है। सब कुछ शून्य ही है-समस्त ज्ञान और ज्ञेय का अभाव ही शून्य तत्त्व है। इस प्रकार कहने वाले नय दुर्नय हैं। यहाँ कारिका में ‘इति’ शब्द प्रकारवाची है, ‘सन्मात्र-परमब्रह्म ही तत्त्व है’। ‘विभ्रम ही तत्त्व है’ इत्यादि प्रकारों को सूचित करता है।
प्रश्न-सुनय वैâसे है ?
उत्तर-संग्रहनय संग्रह रूप से ‘सब कुछ सत्रूप है क्योंकि सभी वस्तु में सत् से अभेद है’ इस प्रकार सभी में एकत्व स्वीकार करता है किन्तु व्यवहारनय उन्हीं में विधिपूर्वक भेद करता है, जैसे जो सत् है वह द्रव्य है अथवा पर्याय है। पुन: अपरसंग्रह ‘जीवादि द्रव्य हैं’ इस प्रकार संग्रह करता है तथा ‘ज्ञान और रागादिभाव पर्याये हैं’ इस प्रकार संग्रह करता है। पुन: अपर व्यवहारनय जो द्रव्य है वह जीव अथवा अजीव है और जो पर्याय हैं वे सहभावी तथा क्रमभावी होती हैं। इस प्रकार परसंग्रह-अपर संग्रह, पर व्यवहार-अपर व्यवहार की परम्परा चलती रहती है, जब तक कि ऋजुसूत्र का विषय नहीं आ जाता है।
विशेषार्थ-संग्रहनय वस्तु को संग्रहरूप से विषय करता है और व्यवहारनय उसमें भेद करता है। संग्रहनय के दो भेद हैं-परसंग्रह और अपरसंग्रह। इन्हीं को सामान्य संग्रह और विशेष संग्रह भी कहते हैं। सामान्य संग्रह सामान्य से चेतन-अचेतन सभी वस्तु को सत् रूप से एकरूप ग्रहण करता है और विशेष संग्रह जीव को द्रव्यरूप से कहता है अथवा अजीव को द्रव्यरूप से कहता है। व्यवहार नय के भी मुख्य दो भेद हैं-पर व्यवहार, अपर व्यवहार। पर संग्रह से ग्रहण किये गये में भेद करने वाला पर व्यवहार है और अपर संग्रह से ग्रहण किये गये में भेद करने वाला अपर व्यवहार है। इन दोनों नयों की परम्परा तब तक चलती रहती है कि जब तक वर्तमान एक समय मात्र की एक पर्याय को विषय करने वाला ऋजुसूत्र नहीं आ जाता है।इस प्रकार से एक ब्रह्ममात्र अथवा ज्ञानमात्र तत्त्व आदि को ग्रहण करने वाले दुर्नय कहलाते हैं और वस्तु के एक अंश-धर्म को ग्रहण कर अन्य धर्म का विरोध नहीं करने वाले सुनय कहे जाते हैं।यहाँ पर वृत्तिकार ने द्रव्य और पर्यायों को ही ग्रहण करके पर्यायों में सहभावी-क्रमभावी ऐसे दो भेद दिखलाये हैं। उनमें सहभावी पर्यायें ही गुण कहलाती हैं और क्रमभावी पर्यायें पर्याय शब्द से जानी जाती हैं।
उत्थानिका-अब ऋजुसूत्र नय का निरूपण करते हैं-
अन्वयार्थ-(ऋजुसूत्रस्य प्रधानं पर्याय:) ऋजुसूत्र का विषय पर्याय है और (चित्रसंविद:) चित्रज्ञान में (चेतनाणुसमूहत्वात्) ज्ञान के अंशों का समूह होने से उसमें (भेदानुपलक्षणं स्यात्) भेद उपलक्षित नहीं होता है।।१३।।
अर्थ-ऋजुसूत्रनय का प्रधान-विषय पर्याय है और चित्रज्ञान में ज्ञान के अंशों का समूह है किन्तु उसमें भेद उपलक्षित नहीं होता है अर्थात् ऋजुसूत्र एकसमयवर्ती वर्तमान पर्याय को विषय करता है किन्तु चित्रज्ञान को विषय नहीं करता है क्योंकि चित्रज्ञान में अनेकों ज्ञान के अंश विद्यमान हैं भले ही वे जाने नहीं जाते हैं।।१३।।
तात्पर्यवृत्ति-ऋजु अर्थात् प्रगुण-सरल वर्तमान पर्याय के लक्षण को जो सूचित करता है-निरूपित करता है वह ऋजुसूत्रनय है अर्थात् ऋजुसूत्रनय का प्रधान-विषय वर्तमान पर्याय मात्र है क्योंकि अतीत पर्यायें विनष्ट हो चुकी हैं और भविष्यत् पर्यायें अभी-अभी उत्पन्न नहीं होने से असिद्ध हैं अत: ये अतीतानागत पर्यायें व्यवहार में उपयोगी नहीं हैं। ‘नय व्यवहार में अविसंवादी होते हैं’ ऐसा वचन है।
प्रश्न-एक चित्रज्ञान अनेकाकार है फिर भी व्यवहार में उपयोगी है।
उत्तर-नील, पीतादि नानारूप चित्र वाला संवेदन-ज्ञान चित्रज्ञान है, वह चेतना के अणुओं का समूह है अर्थात् चेतना-ज्ञान, उसके जो अणु-अंश-अविभागी प्रतिच्छेद हैं, उन ज्ञान के अविभागी प्रतिच्छेदों का समुदाय है इसलिए यह चित्रज्ञान वास्तव में ऋजुसूत्र नय का विषय नहीं है क्योंकि समुदाय प्रतिनियत व्यवहार में उपयोगी नहीं होता है।
प्रश्न-यदि ऐसी बात है तो उस चित्रज्ञान में भेद उपलक्षित क्यों नहीं होता है ?
उत्तर-उस चित्रज्ञान का भेद उपलक्षित नहीं होता है क्योंकि सदृश पर-अपर की उत्पत्ति होने से भ्रम हो जाता है अर्थात् भेदों में अनेक प्रकार उपलक्षित नहीं हैं-दिखते नहीं हैं, उसमें कारण यही है कि सदृश अपर-अपर की उत्पत्ति होने से उन भेदों को ग्रहण करने में बुद्धि वंचित हो जाती है, ऐसा अर्थ है। जिस प्रकार लोहे के गोले आदि में पर्याय का भेद विद्यमान होते हुए भी भ्रमबुद्धि से निश्चित नहीं होता है उसी प्रकार से चित्रज्ञान में भी उसके अंश भेद रहते हुए भी दिखते नहीं हैं।
अथवा कथंचित् द्रव्य के साथ अविनाभावी पर्याय ही ऋजुसूत्र नय का विषय है क्योंकि द्रव्य से निरपेक्ष पर्याय अवस्तुरूप है। निरन्वय वस्तु को मानने वाले क्षणिवैâकांत मत में यह नय ऋजुसूत्राभास है अर्थात् द्रव्यनिरपेक्ष पर्याय को विषय करने वाला नय ऋजुसूत्राभास कहलाता है, ऐसा व्याख्यान करना चाहिए।
विशेषार्थ-बौद्धों ने निरन्वय एक क्षणवर्ती पर्याय को स्वलक्षण कहा है और परमार्थसत् कहते हैं तथा उसे निर्विकल्प प्रत्यक्ष का विषय मानते हैं किन्तु वास्तव में विचार करके देखा जाये तो जैनों द्वारा मान्य ऋजुसूत्रनय एक क्षणवर्ती पर्याय को विषय करता है इसी नय के विषय को एकांत से ग्रहण करने से ये बौद्ध एकांतवादी बन गये हैं इसलिए यह ऋजुसूत्रनय इनके मत से नयाभास हो जाता है।
उत्थानिका-अब शब्द, समभिरूढ़ और इत्यंभूत इन तीनों नयों का भी निरूपण करते हैं-
अन्वयार्थ-(कालकारकलिंगानां) काल, कारक और लिंगों के (भेदात्) भेद से (शब्दार्थ भेद कृत्) अर्थ में भेद को करने वाला शब्दनय है (पर्यायै: तु अभिरूढ़:) और पर्यायवाची शब्दों से भेद करने वाला समभिरूढ़नय है तथा (क्रियाश्रय: इत्थंभूत:) क्रिया के आश्रय से भेद करने वाला एवंभूतनय है।।१४।।
अर्थ-काल, कारक और लिंगों के भेद से अर्थ में भेद करने वाला शब्द नय है, पर्यायवाची शब्दों से अर्थभेद करने वाला समभिरूढ़ नय है और क्रिया के आश्रय से भेद करने वाला इत्थंभूतनय है।।१४।।
तात्पर्यवृत्ति-जो अर्थ-प्रमेय में भेद-नानात्व को करने वाला है वह शब्द नय है। वैâसे भेद करता है ? काल, कारक और लिंगों के भेद से भेद करता है। यह कथन उपलक्षणमात्र है अत: संख्या, साधन और उपग्रह से भी यह नय अर्थ में भेद करता है, ऐसा समझना। उसमें काल भेद को दिखाते हैं-
जीव था, है और होगा यह काल भेद है क्योंकि सत्ता भेद के बिना अभूत-था आदि प्रयोग युक्त नहीं है अन्यथा अतिप्रसंग हो जावेगा। कारक भेद से-देवदत्त देखता है, देवदत्त के द्वारा देखा जाता है, देवदत्त रक्षा करता है, देवदत्त के द्वारा दिया जाता है, देवदत्त से प्राप्त होता है, देवदत्त में पुरुषार्थ है। स्वातन्त्र आदि धर्म के भेद से अभेद में कर्ता आदि कारकों का प्रयोग युक्त नहीं है अन्यथा अतिप्रसंग हो जावेगा।लिंग भेद से-दारा पुल्लिंग है, कलत्र नपुंसकलिंग है और भार्या स्त्रीलिंग है, इनमें पुल्लिंग आदि धर्म से भेद होने पर भी इनका प्रयोग करने पर सर्वत्र उसके नियम के अभाव का प्रसंग हो जावेगा।संख्या के भेद से-जलं एक वचन है, आप: बहुवचन है, आम्रवनं एकवचन है, चैत्रमैत्रौ द्विवचन है, कुलं एक वचन है। यहाँ एकत्व आदि धर्म के भेद से ही उन वचनों में भेद पाया जाता है अन्यथा अतिप्रसंग ही होगा।
साधन के भेद से-देवदत्त पकाता है, तुम पकाते हो, मैं पकाता हूँ। इस प्रकार निश्चित ही अन्य अर्थ आदि के अभाव में प्रथम पुरुषादि का प्रयोग नहीं देखा जाता है अन्यथा अतिप्रसंग ही है।उपग्रह के भेद से भी अर्थ में भेद देखा जाता है। जैसे तिष्ठति-ठहरता है, वितिष्ठते-जाता है, अवतिष्ठते-बैठता है। इस प्रकार से ‘वि अव’ आदि उपसर्गों का परस्पर में भेद होने से अर्थ में भेद हो जाता है अन्यथा प्रतिष्ठते-प्रस्थान करता है, इत्यादि में भी वही ठहरता है, ऐसे अर्थ का प्रसंग आ जावेगा।
अब कारिका के उत्तरार्ध का व्याख्यान करते हैं-
पर्यायवाची शब्दों से अर्थ में भेद को करने वाला समभिरूढ़ नाम का नय है। जैसे-चमकने से इंद्र, समर्थ होने से शक्र, पुरों में विभाग करने से पुरंदर इस प्रकार अर्थ होते हैं। यहाँ इंद्रन आदि धर्म में भेद का अभाव होने पर इंद्र आदि का प्रयोग करना शक्य नहीं है अन्यथा अतिप्रसंग हो जाता है। अभि-अपने अर्थ की तरफ अभिमुख होकर जो रूढ़ है-प्रसिद्ध है वह अभिरूढ़ नय है ऐसा निरुक्ति अर्थ है।पुन: इत्थंभूत नय को कहते हैं-यह नय क्रिया के आश्रित है, विवक्षित क्रिया को प्रधान करता हुआ अर्थ में भेद को करने वाला है। जैसे-जिस समय ही इंद्रन क्रिया से युक्त है उसी काल में इंद्र है। वह न अभिषेक करने वाला है, न पुजारी है। यदि अन्य प्रकार से भी उसका सद्भाव मानेंगे तो क्रिया के शब्द के प्रयोग का नियम नहीं रह सकेगा इसलिए अर्थ में भेद का अभाव होने पर भी कालादि का भेद अविरुद्ध है, इस प्रकार का वैयाकरण का जो एकांत है। वह शब्दनयाभास आदि रूप है।
प्रश्न-इस प्रकार से तो लोक समय-व्याकरणशास्त्र में विरोध आ जाता है ?
उत्तर-लोक समय में विरोध होता है तो होवे, यहाँ तो तत्त्व के विचार में लोक समय की इच्छा के अनुसरण का अभाव है। औषधि रोगी की इच्छा के अनुरूप नहीं होती है।
प्रश्न-पुन: उस विरोध का अभाव वैâसे होगा ?
उत्तर-स्यात्कार के बल से उस विरोध की समाप्ति हो जाती है ऐसा हम कहते हैं क्योंकि सर्वत्र प्रतिपक्ष की आकांक्षारूप उस स्यात्कार का अर्थ संभव है।
नैगम, संग्रह और व्यवहार ये तीन नय द्रव्य को विषय करने वाले होने से द्रव्यार्थिक हैं और ऋजुसूत्र, शब्द, समभिरूढ़ तथा एवंभूत ये चार नय पर्याय को विषय करने वाले होने से पर्यायार्थिक हैं। ये सभी नय परस्पर में एक-दूसरे की अपेक्षा रखते हुए ही व्यवहार के लिए प्रवृत्त होते हैं परस्पर में निरपेक्ष होकर नहीं, इसलिए व्यवहार की उपलब्धि में किस प्रकार से विरोध हो सकता है ? अर्थात् नहीं हो सकता है।
नैगम, संग्रह, व्यवहार और ऋजुसूत्र ये चार अर्थ नय कहलाते हैं तथा शब्द, समभिरूढ़ और एवंभूत ये तीन नय शब्द नय कहलाते हैं क्योंकि इनकी प्रवृत्ति शब्द के आश्रय से होती है।
विशेषार्थ-इस कारिका में शब्द, समभिरूढ़ और एवंभूत इन तीन नयों का स्वरूप बताया है। यहाँ तक नैगम, संग्रह, व्यवहार, ऋजुसूत्र, शब्द, समभिरूढ़ और एवंभूत इन सात नयों का स्वरूप हो चुका है। पूर्व के तीन नय द्रव्य को जानने वाले हैं इसीलिए वे द्रव्यार्थिक कहलाते हैं तथा शेष ऋजुसूत्र आदि चार नय पर्याय को जानने वाले हैं इसलिए पर्यायार्थिक कहलाते हैं।
उसी प्रकार नैगम, संग्रह, व्यवहार और ऋजुसूत्र ये चारों पदार्थों को विषय करने से अर्थ नय हैं और शब्द, समभिरूढ़ तथा एवंभूत ये नय शब्द के निमित्त से पदार्थ को विषय करते हैं अत: ये शब्दनय कहे जाते हैं।
उत्थानिका-शब्द और अर्थ में संकेत ग्रहण का अभाव होने से शब्द के भेद से अर्थ में भेद वैâसे हो सकता है ? प्रत्यक्ष से संकेत का ग्रहण होने पर भी वह व्यवहार में उपयोगी नहीं है क्योंकि गृहीत और संकेत उसी समय नष्ट हो जाते हैं। स्मृति भी संकेत को विषय नहीं करती है क्योंकि वे दोनों अतीत हो चुके हैं। इस प्रकार सौगत की आशंका का निराकरण करते हुए आचार्य कहते हैं-
अन्वयार्थ-(चेत् अक्षधी:) यदि इंद्रियज्ञान (अतीतार्थं) अतीत अर्थ को (वेत्ति) जानता है तब तो (दूरासन्नार्थबुद्धिवत्) दूर और निकटवर्ती पदार्थ के ज्ञान के समान (एकार्थे) एक विषय में (प्रतिभासमिदा) प्रतिभास के भेद से (स्मृति: कुत: न) स्मृति ज्ञान प्रमाण वैâसे नहीं होगा ?।।१५।।
अर्थ-यदि इंद्रियज्ञान अतीत Dार्थ को जानता है तब तो दूर और निकटवर्ती पदार्थ के ज्ञान के समान एक विषय में प्रतिभास के भेद से स्मृतिज्ञान प्रमाण क्यों नहीं है ? अर्थात् प्रमाण है ही है।।१५।।
भावार्थ-बौद्धों की आशंका का उत्तर देते हुए आचार्य ने कहा है कि जब आपके यहाँ इंद्रियज्ञान अपने कारणभूत अतीत अर्थ को जानता है तो स्मृति भी अतीत विषय को क्यों नहीं जान सकती है ? इंद्रियज्ञान और स्मृति दोनों का विषय एक है, अंतर केवल इतना है कि इंद्रियज्ञान उसे स्पष्ट जानता है और स्मृति ज्ञान अस्पष्ट जानता है।
तात्पर्यवृत्ति-सौगत के मत में विषय को ज्ञान का कारण माना है और कार्य के क्षण से पूर्व क्षणवर्ती को कारण कहते हैं। इस प्रकार से यदि ज्ञान अतीत अर्थ अर्थात् स्वकारणभूत शब्द और वाच्य को जानता है तब किस कारण से स्मृति भी अतीत अर्थ को नहीं जानती है ? अपितु जानती ही है।
शंका-इस प्रकार से तो स्मृति को प्रमाणता वैâसे है क्योंकि वह तो गृहीत को ग्रहण करने वाली है ?
समाधान-एक-अभिन्न अतीतपने रूप विशेषता से रहित होने से साधारण जो शब्दार्थ लक्षण वाला विषय है वह अर्थ कहलाता है उस एक अर्थ में भी अतीताकार को परामर्श करने वाले प्रतिभास के भेद से वह स्मृति प्रमाण है।
प्रत्यक्ष से ही जो ‘यह’ इस प्रकार से अनुभव में आता है वही कालांतर में पुन: ‘तत्-वह’ इस आकार से स्मृतिज्ञान के द्वारा विषय किया जाता है। जैसे-दूर और निकटवर्ती पदार्थ का ज्ञान अर्थात् जिस प्रकार से दूरवर्ती वृक्ष में प्रत्यक्ष ज्ञान अस्पष्ट होता है और निकटवर्ती वृक्ष में स्पष्ट होता है। जैसे-दूर और निकटवर्ती वृक्षादि में प्रत्यक्ष ज्ञान अस्पष्ट और स्पष्ट प्रतिभास के भेद से प्रमाण है उसी प्रकार से स्मृति भी प्रमाण है यह अर्थ हुआ है।
उत्थानिका-शब्द और अर्थ में संबंध का अभाव होने से शब्द की प्रमाणता वैâसे होगी ? कि जिससे उसके विषय में शब्दादिक नय समीचीन होवें ? ऐसी आशंका का निराकरण करते हुए आचार्य कहते हैं-
अन्वयार्थ-(अक्षशब्दार्थविज्ञानं) इंद्रिय से होने वाला अर्थ का ज्ञान और शब्द से होने वाला अर्थ का ज्ञान (अविसंवादत:) ये दोनों अविसंवाद की अपेक्षा से (समं) समान हैं, (शब्दज्ञानं) शब्दज्ञान (अनुमानवत्) अनुमान के समान (अस्पष्टं) अस्पष्ट (प्रमाणं) प्रमाण है।।१६।।
अर्थ-अक्ष-इंद्रिय से होने वाला पदार्थ का विज्ञान और शब्द से होने वाला पदार्थ का विज्ञान ये दोनों अविसंवादी होने से समान हैं। यह शब्दज्ञान अस्पष्ट होते हुए भी अनुमान के समान प्रमाण है अर्थात् जैसे अनुमान अस्पष्ट है फिर भी आप उसे प्रमाण मानते हैं। उसी तरह यह शब्द ज्ञान भी भले ही अस्पष्ट हो फिर भी यह प्रमाण है।।१६।।
तात्पर्यवृत्ति-अक्षार्थ विज्ञान और शब्दार्थ विज्ञान समान प्रमाण है। अक्ष अर्थात् इंद्रिय, शब्द अर्थात् वर्ण पदवाक्यात्मक ध्वनि। अर्थ अर्थात् सामान्य विशेषात्मक वस्तु अर्थात् इंद्रिय से होने वाला वस्तु का ज्ञान और शब्द से होने वाला वस्तु का ज्ञान दोनों ही समान प्रमाण हैं। ये दोनों ही वि-विशिष्ट हैं अर्थात् संशयादि से रहित हैं और ये अविसंवादी हैं अर्थात् अर्थक्रिया में व्यभिचरित नहीं होते हैं। जैसे-इंद्रिय से उत्पन्न हुआ अर्थज्ञान अविसंवादी होने से प्रमाण है वैसे ही शब्द से उत्पन्न होने वाला अर्थज्ञान भी अविसंवादी होने से प्रमाण है, ऐसा अर्थ हुआ।
अनाप्त के वचन से उत्पन्न हुआ ज्ञान अर्थक्रिया में विसंवादी होने से अप्रमाण है, इसी प्रकार आप्त के वचन से उत्पन्न हुए ज्ञान को अप्रमाण कहना शक्य नहीं है क्योंकि इन्द्रियज्ञान में भी कहीं पर विसंवाद देखा जाता है और एक जगह विसंवाद देखकर सभी जगह अप्रमाणीक कहने पर तो सर्वत्र ही अप्रमाणता की आशंका बनी रहेगी।
शंका-इंद्रियज्ञान प्रमाण है क्योंकि वह स्पष्ट है, शब्द ज्ञान-आगमज्ञान प्रमाण नहीं है क्योंकि वह अस्पष्ट है ?
समाधान-अस्पष्ट-अविशद भी शब्दज्ञान को प्रमाण मानना चाहिए क्योंकि वह अविसंवादी है। कारण कि अविसंवाद हेतु ही प्रमाणता को घोषित करता है। स्पष्टता अथवा अस्पष्टता प्रमाणता और अप्रमाणता में निमित्त नहीं है क्योंकि इन प्रमाणता और अप्रमाणता में अविसंवाद और विसंवाद ही निमित्त है। जैसे-अनुमानज्ञान अस्पष्ट होते हुए भी विसंवाद का अभाव होने से प्रमाण माना जाता है। उसी प्रकार शब्द से होने वाला आगम ज्ञान भी भले ही अस्पष्ट हो किन्तु उसे प्रमाण मानना चाहिए क्योंकि वह भी अविसंवादी है। यह अविसंवादी हेतु दोनों जगह समान ही है।
उत्थानिका-काल, कारक और लिंग के भेद से शब्द अर्थ में भेद करने वाला है यह कहना ठीक नहीं है क्योंकि उसको ग्रहण करने वाले प्रमाण का अभाव है। ऐसी आशंका का निरसन करते हुए आचार्य कहते हैं-
अन्वयार्थ-(कालादिलक्षणं) काल आदि के लक्षण को (न्यक्षेण) विस्तार से (अन्यत्र परीक्षितं) अन्य ग्रंथों में परीक्षित को (ईक्ष्यं) देख लेना चाहिए (द्रव्यपर्याय सामान्य विशेषात्मार्थ निष्ठितं) जो कि द्रव्य-पर्याय और सामान्य विशेषरूप पदार्थ में विद्यमान है।।१७।।
अर्थ-काल आदि के लक्षण को विस्तार से अन्यत्र-अन्य ग्रंथों में देखना चाहिए, जो कि स्वामी समंतभद्रादि आचार्यों द्वारा परीक्षित है और द्रव्य पर्याय और सामान्य विशेषात्मक पदार्थ में निष्ठित-विद्यमान है अर्थात् द्रव्यपर्यायरूप और सामान्य विशेषरूप जो पदार्थ है उनमें रहने वाला ऐसा जो कालादि का असाधारण लक्षण है उसे अन्य १तत्त्वार्थमहाभाष्य आदि ग्रंथों में विस्तार से देखना चाहिए।।१७।।
तात्पर्यवृत्ति-काल, कारक, लिंग, संख्या, साधन और उपग्रह आदि का असाधारण स्वरूप जो कि स्वामी समंतभद्र आदि आचार्यों के द्वारा परीक्षित है उसे न्यक्ष अर्थात् विस्तार से देखना चाहिए। कहाँ देखना चाहिए ? अन्य तत्त्वार्थमहाभाष्य आदि ग्रंथों में देखना चाहिए। वह वैâसा है ?
पूर्वापर परिणाम में व्यापक ऊर्ध्वतासामान्य को द्रव्य कहते हैं और एक द्रव्य में क्रम से होने वाले जो परिणाम हैं वे पर्यायें कहलाती हैं। वे द्रव्य और पर्यायें तथा सामान्य और विशेष ये हैं स्वरूप जिसके उसे द्रव्यपर्याय सामान्य विशेषात्मक कहते हैं और वही अर्थ-पदार्थ है उसमें जो लक्षण निष्ठित अर्थात् स्थित है वह द्रव्य पर्याय सामान्य विशेषात्मक पदार्थ में रहने वाला असाधारण लक्षण है उसे जानना चाहिए।
इस प्रकार के पदार्थ में ही अर्थक्रिया संभव हैं क्योंकि निरपेक्ष एकांत में उस अर्थक्रिया का विरोध है। पर्यायरहित केवल द्रव्य नहीं है अथवा द्रव्य से व्यतिरिक्त पर्याय भी नहीं है। विशेष से शून्य सामान्य नहीं है अथवा सामान्य से शून्य विशेष नहीं है अर्थात् ये एक-दूसरे से रहित होते हुए प्रमाण की पदवी पर आरोहण नहीं कर सकते हैं क्योंकि वैसी प्रतीति नहीं होती है जिससे कि वे काल, कारक आदि एकांतरूप से हो सकें अर्थात् नहीं हो सकते हैं।उनमें भूत, भविष्यत् और वर्तमान के भेद से काल के तीन भेद हैं जो क्रिया का निर्वर्तक-करने वाला है वह कारक है उसके कर्ता, कर्म, करण, संप्रदान, अपादान और अधिकरण के भेद से छह भेद हैं। शब्द की प्रवृत्ति में निमित्तभूत जो अर्थ का धर्म है वह लिंग कहलाता है, उसके भी स्त्री, पुरुष और नपुंसक के भेद से तीन भेद हैं। संख्या के भी एकत्व, द्वित्व और बहुत्व के भेद से तीन भेद हैं। साधन क्रिया के आश्रित है उसके भी अन्य पुरुष, मध्यम पुरुष और उत्तम पुरुष के अर्थ के भेद से तीन भेद हैं। प्र, पर आदि उपसर्ग को उपग्रह कहते हैं वह अनेक प्रकार का है।
विशेषार्थ-यहाँ पर आचार्यश्री भट्टाकलंक देव का यह कहना है कि जो काल, कारक आदि का लक्षण है, जो कि द्रव्य पर्यायरूप सामान्य विशेषात्मक पदार्थ में रहता है उसको विस्तार से यदि आप जानना चाहते हैं तो श्री स्वामी समंतभद्राचार्य के द्वारा प्रणीत तत्त्वार्थ महाभाष्य नामक ग्रंथ में देखना चाहिए। यहाँ पर इनका लक्षण संक्षिप्त में कहा गया है।
उत्थानिका-एकांत में भी एक में षट्कारक की व्यवस्था का होना वैâसे घट सकता है ? ऐसी आशंका के होने पर आचार्य कहते हैं-
अन्वयार्थ-(एकस्य) एक में (अनेक सामग्री सन्निपातात्) अनेक सामग्री के सन्निधान से (प्रतिक्षणं) प्रतिक्षण (षट्कारकी) षट् कारकों की (प्रकल्प्येत) कल्पना होती है, (तथा कालादिभेदत:) वैसे ही काल आदि के भेद से भी षट्कारक की व्यवस्था होती है।।१८।।
अर्थ-एक में अनेक सामग्री के सन्निधान से प्रतिक्षण षट्कारक की कल्पना होती है। उसी प्रकार काल आदि के भेद से भी षट्कारकों की कल्पना होती है अर्थात् अनेक कारण सामग्रियों की सहायता से एक बहुत भी प्रतिसमय षट्कारकरूप हो सकती हैै।।१८।।
तात्पर्यवृत्ति-एक जीवादि वस्तु में भी छहों कारकों के समुदायरूप षट्कारक व्यवस्था प्रत्येक समय में घटित हो जाती है। वैâसे ? अनेक सामग्री के सन्निपात होने से अर्थात् अनेक अंतरंग और बहिरंग, सामग्री कारण कलापों की सन्निधि होने से षट्कारकी घटित होती है। उसी को कहते हैं-जिस काल में चाक, चीवर आदि की सन्निधि होने से देवदत्त घट को करता है उसी काल में अपने प्रेक्षकजन के सन्निधान से वही देखा जाता है इसलिए वह कर्म है। प्रयोजन की अपेक्षा से देवदत्त के द्वारा कराता है इसलिए करण है। देने योग्य द्रव्य की अपेक्षा से देवदत्त को देता है इसलिए संप्रदान है। अपाय की अपेक्षा से देवदत्त से दूर होता है यह अपादान है। वहाँ पर स्थित द्रव्य की अपेक्षा से देवदत्त में कुण्डल है इस प्रकार अधिकरण है, इस प्रकार अविरोध से वैसी प्रतीति हो रही है क्योंकि प्रतीति में आते हुए विषय में विरोध नाम की कोई चीज नहीं है।
उसी प्रकार से युगपत् के समान ही काल, देश और आकार के भेद से, क्रम से भी षट्कारक रूप व्यवस्था होती है। उसी को स्पष्ट करते हैं-देवदत्त ने किया, करता है अथवा करेगा, इस प्रकार से प्रतीति के बल से सिद्ध है अथवा उस प्रकार एक में षट्कारक को घटित करने के समान काल आदि को भी घटित करना चाहिए।
वैâसे ? कथंचित् अर्थ के भेद से कालादि की कल्पना करना चाहिए क्योंकि सर्वथा अभिन्न में संपूर्ण काल, कारक आदि भेद नहीं हो सकते हैं इसलिए स्याद्वाद में ही श्रुतज्ञान के विकल्प से वे सब घटित होते हैं। सभी नैगमादि सुनय हैं क्योंकि वे प्रत्यक्ष और अनुमान से अविरोधी हैं, अन्यत्र वे दुर्नय हैं क्योंकि प्रत्यक्षादि से विरोधी हैं। इस प्रकार भी भट्टाकलंक देव ने ‘‘भेदाभेदात्मके ज्ञेये१……’’ आदि रूप बहुत ही ठीक कहा है।
प्रश्न-नैगमादि सिद्धांत में नय कहे गये हैं यहाँ तो संग्रह आदि कहे गये हैं पुन: आपका कथन सिद्धांत से विरुद्ध क्यों नहीं होगा ?
उत्तर-ऐसी बात नहीं है, अभिप्राय का भेद है। सबसे कम विषय वाला इत्थंभूतनय है वह क्रिया के भेद से ही अर्थ में भेद करता है। उससे अधिक विषय वाला समभिरूढ़नय है क्योंकि वह पर्यायवाची शब्दों के भेद से अर्थ में भेद करता है। उससे अधिकतर विषय वाला शब्दनय है क्योंकि वह काल आदि के भेद से भेद करता है। उससे पुन: ऋजुसूत्रनय अधिकतम विषय वाला है क्योंकि वह शब्द के गोचर-अगोचर विवक्षित पर्याय को विषय करता है। उससे भी अधिक विषय वाला व्यवहारनय है क्योंकि वह पर्याय से विशिष्ट द्रव्य को ग्रहण करता है। उससे प्रचुर विषय वाला संग्रहनय है क्योंकि वह सकलद्रव्य और पर्याय में व्यापी है, सभी को ग्रहण करता है। पुन: उससे भी अधिक विषय वाला नैगमनय है क्योंकि वह सत्त्व और असत्त्व को गौण तथा मुख्यरूप से ग्रहण करता है इसलिए विषय की अपेक्षा से नैगम आदि नयों का पूर्व निपात सिद्धांत ग्रंथों में युक्त है किन्तु यहाँ पुन: न्यायशास्त्र में समस्त नास्तिकजनों के विसंवाद को दूर करने के लिए सकल पदार्थों के अस्तित्व को सूचित करने वाले संग्रहनय को पूर्व में रखने में विरोध का अभाव है।
विशेषार्थ-यहाँ पर आचार्य ने कारण सामग्री के मिलने से एक में ही षट्कारक व्यवस्था घटाई है। जैसे ‘वीर भगवान२’ सभी सुर-असुरों से पूजित हैं, वीर का बुद्धिमान लोग आश्रय लेते हैं, वीर ने अपने कर्मों के समूह को नष्ट कर दिया है,वीर के लिए भक्ति से मेरा नमस्कार होवे, वीर से यह धर्मतीर्थ प्रवृत्त हुआ है, वीर का तपश्चरण घोर-कठोर है, वीर में श्री, द्युति, कीर्ति, कांति और धृति रहती हैं, हे वीर! आपमें भद्र-कल्याण है। यहाँ पर संबोधन समेत आठ कारक हो गये हैं। षट्कारक में संबंध कारक और संशोधन कारक अपेक्षित नहीं रहते हैं।
यह षट्कारक व्यवस्था एक वस्तु में युगपत् भी घट जाती है और काल, देश, आकार आदि के क्रम से भी घटित होती है।
पुन: आचार्य ने कहा है कि नैगम आदि नय स्याद्वाद में, सुनय में और एकांत पक्ष में दुर्नय हैं। आगे प्रश्न यह हुआ है कि सिद्धांत ग्रंथोें में इन नयों में नैगमनय सबसे प्रथम है। यहाँ आपने संग्रह को सबसे प्रथम लिया है इसलिए आपका कथन सिद्धांत से विरोधी है, इस पर आचार्यश्री ने उत्तर देते हुए कहा है कि नैगमनय का विषय सबसे अधिक है, उससे कुछ कम विषय संग्रहनय का है। आगे-आगे ये नय अल्प-अल्प विषय वाले होते हैं, इस अपेक्षा से सिद्धांत ग्रंथ में इनका क्रम नैगम से है किन्तु यहाँ न्यायशास्त्र में अन्य एकांतवादी जनों को समझाने की प्रधानता से कथन होता है। यहाँ पर नास्तिकवादी जनों की मान्यता का खंडन करने के लिए संपूर्ण अस्तित्व का ग्राहक संग्रहनय पहले कहा गया है इसलिए कोई दोष नहीं आता है। ऐसे ही अनेकों उदाहरण हैं-सिद्धांत ग्रंथ में मति, श्रुत दोनों ज्ञानों को परोक्ष कहा है और न्याय में मतिज्ञान को सांव्यवहारिक प्रत्यक्ष कहा है। सिद्धांत में दर्शन२ को स्वरूप को ग्रहण करने वाला माना है और न्याय में उसे सत्तामात्र को अवलोकन करने वाला माना हैै। सिद्धांत में इंद्रियों का क्रम स्पर्शन, रसना, घ्राण, चक्षु और श्रोत्र रूप से कहा है और मूलाचार में चक्षु, श्रोत, घ्राण आदि के अक्रम से कहा है। सिद्धांत में जीव, अजीव, आस्रव, बंध, संवर, निर्जरा और मोक्ष ये तत्त्वों का क्रम है किन्तु समयसार में जीव, अजीव, आस्रव, संवर, निर्जरा, बंध और मोक्ष ऐसा क्रम कर दिया है।
कहने का मतलब यह है कि सिद्धांत ग्रंथों का कथन हीरे के कांटे के समान है और अन्य ग्रंथों का कथन अपेक्षाकृत अक्रम से भी हो जाता है किन्तु इस बात से पूर्वापर विरोध दोष नहीं समझना चाहिए।
उत्थानिका-नय विकल्पात्मक है इसलिए वे तत्त्वों के ज्ञान की सिद्धि नहीं करा सकते हैं। जैसे-स्मृति आदि तत्त्वों के ज्ञान को कराने में असमर्थ हैं, इस प्रकार की सौगत की आशंका का निरसन करते हुए प्रकरण के उपसंहार को कहते हैं-
अन्वयार्थ-(दृष्टि:) प्रत्यक्षज्ञान (एकत्र) एक जगह (चिंतया बिना) तर्क के बिना (साध्येन हेतो: व्याप्तिं) साध्य के साथ हेतु की व्याप्ति को (न स्फुटयति) स्फुट नहीं कर सकता है, (एष: तर्को) यह तर्क (साकल्येन) सकलरूप से (अनधिगत विषय:) नहीं जाने हुए को विषय करने वाला है। (तत्कृतार्थैकदेशे) उसके द्वारा निश्चित विषय के एकदेश में (अनुमाया: च प्रामाण्येन) अनुमान की प्रमाणता होने पर (स्मरण- मधिगतार्थादिसंवादि) स्मृति भी अधिगत अर्थादि के विषय में संवादी हैं (सर्वं संज्ञानं च प्रमाणं) और सभी प्रत्यभिज्ञान प्रमाण हैं (अत: सप्तधाख्यै तथौघै:) इसलिए सात प्रकार के नय समूहों से (समाधिगति:) सम्यक् प्रकार से ज्ञान होता है।।१९।।
अर्थ-दृष्टि-प्रत्यक्ष एकत्र-महानस आदि में तर्क के बिना साध्य के साथ हेतु की व्याप्ति को स्फुट नहीं कर सकता है। यह तर्क सकल रूप से नहीं जाने हुए को विषय करने वाला है, उसके द्वारा निश्चित विषय के एकदेश में (साध्य में) अनुमान की प्रमाणता होने पर स्मृति भी अधिगत अर्थादि के विषय में संवादी है अत: प्रमाण है और सभी सम्यग्ज्ञान-प्रत्यभिज्ञान भी प्रमाण हैं क्योंकि वह भी अविसंवादी हैं, इसलिए सात प्रकार के नयों के समूह से जीवादि पदार्थों का सम्यक् प्रकार से ज्ञान होता है अर्थात् अनुमान को चार्वाक के सिवाय सभी ने प्रमाण माना है किन्तु स्मृति, प्रत्यभिज्ञान और तर्क को जैनों के सिवाय कोई भी प्रमाण नहीं मानते हैं कि तर्क के बिना अनुमान ज्ञान उदित ही नहीं हो सकता है तथा प्रमाण के द्वारा जाने हुए विषय के एकदेश को जानने वाले नय हैं उन नयों से भी जीवादि पदार्थों का सम्यग्ज्ञान होता है।।१९।।
तात्पर्यवृत्ति-एकत्र-एक महानस-रसोई आदि स्थान में दृष्टि-साध्य और साधन का जो दर्शन-प्रत्यक्ष है, वह साध्य-अग्नि आदि के साथ साधन-धूमादि हेतु की व्याप्ति को प्रकाशित नहीं करता है। किस रूप से प्रकाशित नहीं करता है ? साकल्य से अर्थात् सकल-देश, काल से Dांतरित साध्य और साधन के विशेषों का भाव साकल्य कहलाता है। चिंता-तर्क प्रमाण के बिना वह प्रत्यक्ष संपूर्ण रूप से साध्य-साधन के अविनाभाव को नहीं बता सकता है।साध्य और साधन के संबंध का दर्शन-प्रत्यक्ष दृष्टांत धर्मी में सकलरूप से व्याप्ति को जानने में समर्थ नहीं है अन्यथा अनुमान व्यर्थ हो जावेगा और उस देखने वाले अभिज्ञत्व की आपत्ति आ जावेगी।
प्रश्न-तब कौन सा प्रमाण उस व्याप्ति को स्पष्ट करता है ?
उत्तर-यह तर्क प्रमाण है जो कि ज्ञान सकलरूप से साध्य-साधन की व्याप्ति को स्फुट करता है और वही ज्ञान सकल अनुमानिक जनों में प्रसिद्ध ‘तर्क’ इस नाम से कहा जाता है।
प्रश्न-यह तर्क तो गृहीत को ग्रहण करने वाला होने से अप्रमाण है ?
उत्तर-नहीं, यह नहीं जानते हुए को विषय करने वाला है। अनधिगत अर्थात् प्रमाणांतर से अनिश्चित जो अविनाभाव है वह इसका विषय है।
प्रश्न-वैâसा संज्ञान-सम्यग्ज्ञान अर्थ के विषय प्रमाण होता है ?
उत्तर-स्मृति ज्ञान प्रमाण होता है क्योंकि वह अधिगत अर्थ के विषय में अविसंवादी है अर्थात् अधिगत-प्रत्यक्ष से अनुभूत जो अर्थ-विषय है उसमें यह विसंवादरहित है और यह अनुमान की प्रमाणता होने पर सम्यग्ज्ञान है। कहाँ पर है ? तत्कृत अर्थ के एकदेश में है अर्थात् तत्-उस तर्क से कृत-निश्चित जो अर्थ-अविनाभाव है उसका एकदेश-जो साध्य है उसमें वह अनुमान प्रमाण है क्योंकि वह स्मृति और तर्क प्रमाण के साथ अविनाभावी है, यह अर्थ हुआ।
अथवा संज्ञान-प्रत्यभिज्ञान भी प्रमाण है क्योंकि वह भी अविसंवादी है। केवल ये परोक्ष ही विकल्पात्मक हैं ऐसी बात नहीं है किन्तु सभी प्रत्यक्ष भी विकल्पात्मक प्रमाण हैं क्योंकि वे ही व्यवहार में उपयोगी होते हैं। निर्विकल्पक दर्शन तो किसी विषय में भी उपयोगी नहीं है। इस कारण से तर्क आदि के समान विकल्पात्मक ही नय समुदायों से जीवादि तत्त्वों का सम्यक् प्रकार से निर्णय होता है। वे नय कितने हैं ? नैगम आदि से सात प्रकार के हैं क्योंकि ‘प्रमाणनयैरधिगम:१’ ऐसा सूत्रकार का वचन है अर्थात् प्रमाण और नयों से तत्त्वों का ज्ञान होता है ऐसा कहा है।
प्रश्न-प्रमाण के द्वारा परिगृहीत अर्थ को विषय करने वाले होने से ये भी नय निर्विषय वाले हैं ?
उत्तर-ऐसा नहीं कहना, क्योंकि द्रव्य पर्यात्मक वस्तु प्रमाण के द्वारा परिगृहीत है-जानी जाती है और नय उसके एक देशरूप द्रव्य अथवा प्रतिपक्ष की अविनाभावी पर्याय में प्रवृत्त होते हैं। ‘सकलादेश प्रमाणाधीन है और विकलादेश नयाधीन है’ ऐसा प्रवचन-आगम में कहा हुआ है।
उत्थानिका-सौगत आदि के मत में भी तत्त्वों का ज्ञान होता है, इस प्रकार की आशंका के होने पर कहते हैं-
अन्वयार्थ-(स्याद्वादिने) स्याद्वादी (निरस्तबाधक धिये) ज्ञानावरणादि बाधक कारणों से रहित ऐसे ज्ञान वाले (ते सर्वज्ञाय नमस्तात्) आप सर्वज्ञ को नमस्कार होवे। (एकांतवादी) एकांतवादी बुद्ध आदि (स्वमतं अभ्यस्त अपि) अपने मत का अभ्यास करके भी (शक्य परीक्षणं) जिसका परीक्षण करना शक्य है ऐसे (अनेकांतभाव) अनेकांतात्मक (प्रत्यक्षं) प्रत्यक्षरूप (तत्त्वं) तत्त्व को (अलक्षयन्) नहीं जानते हुए (सकलवित् न) सर्वज्ञ नहीं हैं। (तत:) इसलिए (अकलंक) हे कर्मकलंकरहित अकलंक देव! (प्रेक्षावान्) बुद्धिमानजन (त्वां जिनं वीरं एवं) आप जिनेन्द्र भगवान वीरप्रभु की ही (शरणं याति) शरण में आते हैं।।२०।।
अर्थ-स्याद्वादी, ज्ञानावरण आदि बाधक कारणों से रहित ज्ञानधारी आप सर्वज्ञ भगवान को मेरा नमस्कार होवे। एकांतवादी बुद्ध, कपिल आदि अपने मत का अभ्यास करके भी जिसका विवेचन करना शक्य है ऐसे अनेकांतात्मक तत्त्व को जो कि प्रत्यक्ष-स्पष्ट है उसको नहीं जानते हुए सकलवित्-सर्वज्ञ नहीं हैं। इसलिए हे कर्मकलंक रहित अकलंक देव! प्रेक्षावान्-बुद्धिमान लोग आप जिनेन्द्र भगवान वीर प्रभु की ही शरण में आते हैं।।२०।।
भावार्थ-एकांतवादी बुद्ध, कपिल, महेश्वर, ब्रह्मा आदि अपने एकांतपक्ष के दुराग्रही हैं। यही कारण है कि जिसकी परीक्षा करना शक्य है ऐसे प्रत्यक्षगोचर अनेकांतस्वरूप तत्त्व को तो नहीं मानते हैं और यद्वा-तद्वा कल्पना करते बैठते हैं इसलिए ही बुद्धिमान लोग सत्य वक्ता सर्वज्ञ वीरप्रभु की शरण में ही आते ंहैं।
तात्पर्यवृत्ति-एकांतवादी अर्थात् एकांतरूप केवल द्रव्य ही तत्त्व है अथवा पर्याय ही तत्व है, ऐसा कहने का जिन का स्वभाव है वे एकांतवादी बुद्ध, कपिल आदि जन त्रिकालगोचर अशेष द्रव्य पर्यायों को जानने वाले सर्वज्ञ नहीं हो सकते हैं क्योंकि वे अनेकांत स्वरूप को आत्मसात् करने वाले ऐसे जीवादि पदार्थों के स्वरूप को नहीं जानते हैं। उन जीवादि पदार्थों के स्वरूप का परीक्षण करना संशय आदि का व्यवच्छेद करके उनका विवेचन करना यद्यपि शक्य है, लौकिकजनों के गोचर है, प्रत्यक्ष-स्पष्ट है फिर भी वे लोग नहीं जानते हैं। निरन्वय विनाश आदि भावना से सहित चित्र वाले वे लोग सर्वथैकांतरूप अपने मत का अभ्यास करके अनेकांत तत्त्व को जानने में समर्थ नहीं होते हैं पुन: उनको सर्वज्ञता वैâसे हो सकती है ?इस कारण से ज्ञानावरण आदि कलंक से रहित भो अकलंकदेव! आपको मैं नमस्कार करता हूँ। वैâसे हैं वे अकलंक भगवान् ? सर्वज्ञ हैं-लोग-अलोक के सभी वस्तु समुदाय को जानने वाले हैं ‘सर्वं जानातीति सर्वज्ञ:’ इस व्युत्पत्ति के अनुसार सब कुछ जानने वाले हैं। पुन: वे वैâसे हैं ?
बाधकरूप जो दोष और आवरण हैं, उनको अनेकांत तत्त्व वâी भावना के बल से नष्ट कर देने से बाधा रहित ज्ञान को जो धारण करने वाले हैं। पुन: वैâसे हैं ? स्यात्-कथंचित् सत्-असत् आदि अनेकांंतात्मक तत्त्व को कहने वाले स्याद्वादी हैं। ऐसे आपको मेरा नमस्कार होवे।केवल मैं ही आपको नमस्कार नहीं करता हूँ किन्तु सभी प्रेक्षावान्-परीक्षकजन आपकी शरण में आते हैं। नित्य प्रवृत्त होने वाले वर्तमान की अपेक्षा से इस प्रकार का वचन है।क्या नाम वाले भगवान् की शरण में परीक्षक लोग आते हैं ? जिनका ‘वीर’ नाम है ऐसे जो अंतिम तीर्थंकर वर्धमान भगवान हैं पुन: वे वैâसे हैं ? जिन हैं-नानाविध विषम भव वन में भ्रमण के कारणभूत दुष्कृत को जो जीतते हैं, वे जिन कहलाते हैं। सभी लोग उनकी शरण को प्राप्त करते हैं क्योंकि वे तीर्थंकर शास्त्रकारों का उपकार करने वाले हैं।
विशेषार्थ-यहाँ पर श्री भट्टाकलंक देव ने तीन विशेषणों से विशिष्ट देव को नमस्कार किया है। सर्वज्ञ, निरस्तबाधक धी और स्याद्वादी। ये तीनों विशेषण भगवान उमास्वामी के द्वारा तत्त्वार्थसूत्र महाशास्त्र की आदि में किये गये मंगलाचरण के समान ही हैं। स्याद्वादी विशेषण मोक्षमार्ग के नेतृत्व को सूचित करता है, निरस्तबाधक धी विशेषण कर्म पर्वत के नेतृत्व को स्पष्ट कर रहा है और सर्वज्ञ विशेषण तत्त्वों के ज्ञातृत्व को बतला रहा है। ऐसे ही श्री समंतभद्रस्वामी ने आप्त के सर्वज्ञ, वीतराग और हितोपदेशी ये तीन विशेष गुण बतलाये हैं सो यहाँ भी सर्वज्ञ से सर्वज्ञ, निरस्त बाधक बुद्धि से वीतरागता और स्याद्वादी से हितोपदेशिता सिद्ध हो जाता है। ऐसे तीन विशेषणों से विशिष्ट को नमस्कार करके श्री अकलंक देव ने अपने नाम को धारण करने वाले ऐसे कर्म कलंक रहित अकलंक भगवान को संबोधन करके कहा है कि हे अकलंक भगवन्! आप जिन वीर की शरण में सभी परीक्षक लोग आ जाते हैं।(अब वृत्तिकार श्री अभयचंद्रसूरि श्री भट्टाकलंक देव और प्रभाचंद्राचार्य का स्मरण करते हुए इस परिच्छेद को पूर्ण करते हुए श्लोक कहते हैं)-
श्लोकार्थ-श्रीमान् भट्टाकलंकरूप चंद्रमा की प्रभा-किरणों से यह नय और दुर्नय के निरूपण रूप धान्य समूह पुष्टि को प्राप्त हुआ है। उसमें नय से निष्ठुर-कुशल यह श्री अभयचंद्रसूरि के द्वारा रचित तात्पर्यवृत्ति अखिल जनों के हित के लिए अर्थ के पाक की पटुता को प्राप्त होती है।।१।।
भावार्थ-धान्य आदि के खेत चंद्रमा की किरणों से पुष्टि को प्राप्त होते हैं, बढ़ते हैं, पुन: पक जाते हैं तब लोगों को फल देने लगते हैं। ऐसे ही यहाँ पर वृत्तिकार ने कहा है कि सुनय और दुर्नय का निरूपण करने वाला जो यह प्रकरण है वह धान्य का खेत है उसे श्री अकलंकदेव रूपी चंद्रमा के द्वारा प्रगट हुई किरणों ने अथवा प्रभाचंद्र सूरि की वाणी ने पुष्ट किया है, बढ़ाया है, पुन: मैंने जो तात्पर्यवृत्ति टीका की है उसने इस धान्य को पकाकर फल देने वाली कर दिया है अर्थात् सभी भव्य जीव इस टीका के आधार से सुनय-दुर्नय के मर्म को समझकर उसके फलस्वरूप सम्यग्ज्ञान को प्राप्त कर लेंगे।
इस प्रकार श्री अभयचंद्रसूरि कृत लघीयस्त्रय की स्याद्वादभूषण संज्ञक तात्पर्यवृत्ति टीका में पाँचवां परिच्छेद पूर्ण हुआ।
नय प्रवेश नाम से द्वितीय प्रकरण वाला द्वितीय महाधिकार समाप्त हुआ।