एक धर्म का सम्यक् कथन करना नय है। विकल-विवक्षित एक धर्म का सं-सम्यक् प्रकार से-प्रतिपक्ष की अपेक्षा से कथा-प्रतिपादन करना नय है, जैसे जीव ज्ञाता ही है, ऐसा देखना चाहिए इत्यादि।
प्रश्न-पहले आपने कहा है कि ज्ञाता का अभिप्राय नय है, पुन: इस समय ‘वचनात्मक नय हैं’ ऐसा आप कह रहे हैं, सो क्या बात है ?
उत्तर-उपचार से नय के हेतुभूत वचन को भी नयपना विरुद्ध नहीं है, जैसे कि श्रुतज्ञान के हेतुभूत वचन को श्रुत, ऐसा नाम कह देते हैं।
उसी का स्पष्टीकरण करते हैं-
कथंचित् जीव ही ज्ञानादि अनेक धर्मात्मक है, यह प्रमाणवाक्य है। कथंचित् अस्ति ही जीव है वह नय वाक्य है और यह सप्तभंगी से प्रतिष्ठित है।
स्वद्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव की विवक्षा से जीव कथंचित् अस्ति रूप ही है। परद्रव्य, क्षेत्र, काल और भाव की विवक्षा से जीव कथंचित् अस्ति रूप ही है। स्वपर द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव की क्रम से विवक्षा होने से कथंचित् जीव अस्तिनास्तिरूप ही है। युगपत् स्व और पर द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव की विवक्षा से जीव कथंचित् अवक्तव्य ही है। स्वद्रव्यादि चतुष्टय की विवक्षा के साथ युगपत् स्वपर द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव की विवक्षा से जीव कथंचित् अस्तिअवक्तव्य ही है। परद्रव्यादि विवक्षा के साथ युगपत् स्वपर द्रव्य, क्षेत्र, काल,भाव की विवक्षा से जीव कथंचित् नास्ति अवक्तव्य है। क्रम से स्वपर द्रव्यादि की विवक्षा के साथ युगपत् स्वपर द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव की विवक्षा से जीव कथंचित् अस्ति-नास्ति अवक्तव्य ही है।इस प्रकार से प्रत्यक्ष और अनुमान के अविरोध रूप से विधि-प्रतिषेध के द्वारा सर्वत्र सप्तभंगी कल्पना संभव है। इसी प्रकार से एक-अनेक, नित्य-अनित्य और भेद-अभेद आदि में भी सप्तभंगी को लगा लेना चाहिए।
विशेषार्थ-यहाँ पर आगम के दो व्यापार बताये हैं-एक तो स्याद्वाद-प्रमाण, दूसरा नय। प्रत्येक वस्तु को अनेक धर्मात्मक ग्रहण करने वाला स्याद्वाद नाम वाला प्रमाण वाक्य है और प्रत्येक वस्तु के विवक्षित किसी एक धर्म को उसके विरोधी धर्म की अपेक्षा के साथ ग्रहण करने वाला नय वाक्य है। जैसे जीव को अस्तित्व आदि साधारण धर्मों से, चेतनत्व आदि असाधारण धर्मों से और उभयात्मक धर्मों से सहित अनेक धर्म वाला कहना। यह प्रमाण वचन है। उसके अस्ति धर्म को स्वद्रव्यादि चतुष्टय की अपेक्षा से कहते हुए भी उसके प्रतिपक्षी नास्ति धर्म का निषेध नहीं करना किन्तु गौण करना यह सुनय का काम है। यदि नास्ति धर्म का निषेध करके यह दुराग्रह रूप एकांत से जीव को अस्तिरूप ही कहे तब यह दुर्नय हो जाता है। यह नयवाक्य सप्तभंगी से युक्त होता है। (ऐसा समझना)।
उत्थानिका-‘सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्राणि मोक्षमार्ग:’ इत्यादि वाक्यों में, शास्त्र में अथवा लोक में स्यात्कार का प्रयोग क्यों नहीं किया गया है कि जिससे सर्वत्र वाक्य का अर्थ अनेकांत होवे ? इस प्रकार का आक्षेप होने पर आचार्य कहते हैं-
अन्वयार्थ-(चेत् प्रयोजक: कुशल:) यदि प्रयोगकर्ता कुशल है, तो (सर्वत्र) सभी जगह (विधौ निषेधे अपि) विधिवाक्य और निषेधवाक्य में भी (अन्यत्र) अन्य किसी में भी (अर्थात्) सामर्थ्य से (स्यात्कार:) स्यात्कार (अप्रयुक्ते अपि) बिना प्रयोग करने पर भी (प्रतीयते) प्रतीत हो जाता है।।१३।।
अर्थ-यदि प्रयोजक कुशल है तो सर्वत्र विधिवाक्य में या निषेधवाक्य में भी अथवा अन्य प्रयोग नहीं करने पर भी स्यात्कार शब्द अर्थ से प्रतीति में आ जाता है।।१३।।
तात्पर्यवृत्ति-स्यात् यह पद अव्यय रूप है, ऐसा यह स्यात्कारपद सर्वत्र-शास्त्र में अथवा लोक में विधि को-अस्तित्व आदि को साध्य करने में प्रतीति में आता है-जाना जाता है। केवल विधि में ही नहीं किन्तु निषेध में भी-असत्त्व आदि को साध्य करने पर भी यह स्यात्कार प्रतीति में आता है। अन्यत्र भी-अन्य अनुवाद के अतिदेश आदि में भी यह प्रतीत होता है।किस प्रकार का होता हुआ ? अप्रयुक्त भी ‘स्यात् अस्ति जीव:’ ऐसा कथन नहीं करने पर भी यह स्यात्कार अर्थ-सामर्थ्य से (अर्थापत्ति से) प्रतीत हो जाता है। उसी का स्पष्टीकरण-
मोक्षमार्ग को सम्यग्दर्शन आदि त्रयात्मक कहने पर उसमें एकत्व वैâसे है ? अथवा एकत्व मानने पर तीनपना वैâसे है ? इस प्रकार के विरोध में कथंचित् इस प्रकार से ही परिहार होता है किन्तु सर्वथा से नहीं। क्योंकि द्रव्य और पर्याय की अपेक्षा से मार्ग में एकत्व और अनेकत्व का विरोध नहीं है इसलिए ‘कथंचित्’ इस अर्थ की सामर्थ्य से उसका वाचक स्यात्कार प्रयुक्त न होते हुए भी प्रतीति में आता ही है। यदि प्रयोजक-प्रतिपादन करने वाला व्यक्ति कुशल है-व्यवहार में जानकार है, तो ऐसी बात है।
उसी प्रकार से एवकार भी प्रतीति में आता है। उसी हेतु से रत्नत्रय ही मोक्षमार्ग है, इस प्रकार के अवधारण के अभाव में सम्यग्दर्शन ही मार्ग हो जावेगा अथवा अन्य ही कोई अर्थात् ज्ञान ही या चारित्र ही मार्ग हो जावेगा, अथवा कोई भी दो ही मार्ग हो जावेंगे, इस प्रकार से अतिप्रसंग दोष दुर्निवार हो जावेगा अर्थात् एवकार का प्रयोग न होने पर भी सामर्थ्य से एवकार का अर्थ लेना चाहिए अन्यथा कुछ भी अर्थ हो जावेगा किन्तु ऐसी बात तो है नहीं क्योंकि असाधारण स्वरूप को ही लक्षण कहते हैं।
प्रश्न-इस प्रकार बिना प्रयुक्त भी यदि स्यात्कार और एवकार की सामर्थ्य से प्रतीति हो जाती है तब तो कोई भी कहीं पर इनको क्यों प्रयुक्त करते हैं ?
उत्तर-ऐसा नहीं कहना, क्योंकि प्रतिपाद्य-ाfशष्य के अभिप्राय के निमित्त से उनका प्रयोग होता है।
भावार्थ-आचार्यों का यह स्पष्ट कहना है कि यद्यपि स्थल-स्थल पर वाक्य-वाक्य में स्यात्कार का प्रयोग नहीं होता है फिर अर्थापत्ति से लगा लेना चाहिए। जैसे किसी ने कहा जीव शुद्ध है तो समझ लेना चाहिए कि कथंचित् अशुद्ध भी है। ऐसे ही एवकार के विषय में भी प्रयुक्त न होने पर भी यथोचित् उसका भी अर्थ लेना चाहिए और जहाँ-जहाँ पर इनका स्पष्ट प्रयोग है वहाँ पर शिष्यों के अभिप्राय से आचार्यों ने प्रयोग कर दिया है।
उत्थानिका-वर्ण, पद और वाक्यात्मक शब्द विवक्षा के विषय हैं, पुन: स्यात्कार अर्थापत्ति से वैâसे प्रतीति का विषय होगा ? ऐसी आशंका होने पर आचार्य कहते हैं-
अन्वयार्थ-(वर्णा: पदानि वाक्äयानि) वर्ण, पद और वाक्य ये (अवांछितांन् वांछितान् च) अविवक्षित और विवक्षित (अर्थान् प्रादु:) अर्थों को कहते हैं और (क्वचित् ना इति) कहीं पर नहीं भी कहते हैं, (ईदृशी इयं प्रसिद्धि:) ऐसी यह प्रसिद्धि है (तो अतिक्रम्य एव) इस प्रसिद्धि को उल्लंघन करके ही (स्वेच्छया वदतां) स्वेच्छा से कहने वालों को (युज्यते) क्या यह युक्त है ? कि (वचनं) वचन (वक्त्रभिप्रेतमात्रस्य) वक्ता के अभिप्रायमात्र के (सूचकं) सूचक हैं (नु इति) अहो! इस प्रकार तो बड़ा आश्चर्य है।।१४-१५।।
अर्थ-वर्ण, पद और वाक्य ये अवांछित-अविवक्षित और वांछित-विवक्षित भी अर्थों को कहते हैं और कहीं पर नहीं कहते हैं, इस प्रकार की यह प्रसिद्धि है। इस प्रसिद्धि का उल्लंघन करके स्वेच्छावृत्ति से ही कहने वालों को क्या यह कहना युक्त है कि वचन वक्ता के अभिप्रायमात्र को ही कहते हैं ? अहो! बड़े आश्चर्य की बात है।।१४-१५।।
तात्पर्यवृत्ति-गकार आदि अक्षर वर्ण हैं तथा गौ आदि शब्द पद कहलाते हैं और ‘गाय को लावो’ इत्यादि वाक्य संज्ञक हैं, ये अवांक्षित-अविवक्षित भूमि आदि को वांछित-विवक्षित सास्नादिमान् आदि अर्थ को-वाच्य को कहते हैं। किन्हीं मंदबुद्धि वाले शिष्यों में नहीं भी कहते हैं क्योंकि उनको इनसे अर्थ का बोध नहीं होता है, इस प्रकार से सर्वजन प्रतीति प्रसिद्ध है, ईदृशी-ऐसी विचित्र रूढ़ि को व्यवहारीजन स्वीकार करते हैं क्योंकि उसी प्रकार से ही अर्थक्रिया हो सकती है।
उनमें वर्ण, स्वर और व्यंजनरूप से चौंसठ हैं। परस्पर में सापेक्ष वर्गों का निरपेक्ष समुदाय पद कहलाता है, उसके अव्यय और अव्ययरहित की अपेक्षा से दो भेद हैं। उनमें भी अव्ययरहित के सुबंत और तिङंत की अपेक्षा से दो भेद हैं और तस्, आदि के भेद से अव्यय अनेक प्रकार का है। परस्पर सापेक्ष पदों का जो निरपेक्ष समुदाय है वह वाक्य है। उसके भी क्रिया प्रधान, कारक प्रधान और उभयात्मक ऐसे तीन भेद हैं।
इस प्रसिद्धि का अतिक्रमण करके ही-उल्लंघन करके ही स्वैर भाव से कहने वाले सौगतों को क्या यह कहना युक्त है कि शब्द वक्ता के अभिप्राय मात्र के सूचक हैं अर्थात् प्रयोजक की विवक्षा मात्र को ही कहने वाले हैं किन्तु बाह्य अर्थ को नहीं। नु-अहो! यह बड़े आश्चर्य की बात है। इस कथन से यहाँ पर आक्षेप सूचित हो रहा है क्योंकि सामान्य विशेषात्मक बाह्य पदार्थों की शब्द के प्रयोग से प्रतीति होती है, वे शब्द ही उस अर्थ को कहते हैं। उस शब्द से स्वप्न में भी अभिप्राय की प्रतीति नहीं होती है। जिससे जिस विषय में प्रतीति, प्रवृत्ति और प्राप्ति का होना सम्यक् प्रकार से अनुभव में आता है, वह उसका अर्थ है, यह न्याय है।
भावार्थ-बौद्ध का कहना है कि शब्द बोलने वाले के अभिप्राय मात्र को ही कहते हैं न कि पदार्थों को। इस पर आचार्य आश्चर्य व्यक्त करते हुए कहते हैं कि जैसा कि लोकव्यवहार में अनुभव आ रहा है कि शब्द अपने वाच्य अर्थ को कहते भी हैं, पुन: प्रतीति के विरुद्ध कथन करना कहाँ तक उचित है ?
उत्थानिका-अब नय के भेदों को कहते हैं-
अन्वयार्थ-(श्रुतभेदा: नया:) श्रुतज्ञान के भेद नय हैं, वे (नैगमादिप्रभेदत:) नैगम आदि के भेद से (सप्त) सात हैं, (ते द्रव्य पर्याय मूला:) वे द्रव्य और पर्यायमूलक हैं। (एकं अन्वयानुगं द्रव्यं) एक और अन्वय का अनुसरण करने वाला द्रव्य है, (निश्चयात्मकं) वह निश्चय स्वरूप है और (अन्य: अपि) अन्य पर्याय भी (व्यतिरेक पृथक्त्वग:) व्यतिरेक तथा पृथक्त्व का अनुसरण करने वाली है। (निश्चय व्यवहारौ तु) निश्चय और व्यवहार तो (द्रव्यपर्यायमाश्रितौ) द्रव्य और पर्याय का आश्रय लेने वाले हैं।।१६-१७।।
अर्थ-श्रुत के भेद नय हैं और ये नैगम, संग्रह आदि के प्रभेद से सात होते हैं। वे नय द्रव्य और पर्यायमूलक हैं। एक और अन्वय का अनुसरण करने वाला द्रव्य कहलाता है, वह निश्चयात्मक है और पर्याय भी व्यतिरेक तथा पृथक्त्व का अनुसरण करती है। द्रव्य का आश्रय करने वाला निश्चयनय है और पर्याय को आश्रय करने वाला व्यवहारनय है। ऐसे निश्चय और व्यवहार ये दो भी भेद होते हैं।।१६-१७।।
तात्पर्यवृत्ति-वे पूर्वोक्त लक्षण वाले नय होते हैं, वे श्रुत-सकलादेशरूप आगम के भेदरूप हैं इसलिए वे विकलादेश कहलाते हैं। वे नैगम, संग्रह अदि प्रभेदों का आश्रय लेकर सात हो जाते हैं। वे द्रव्य और पर्याय को विषय करने वाले होने से द्रव्य पर्यायमूलक हैं।