(पद्यानुवाद-गणिनी आर्यिका श्री ज्ञानमती माताजी)
मुनिव्रत लेकर निर्मल स्वतत्त्व, को जान विपिन में जा करके।
मोहोदय जनित विविध विध के, संपूर्ण विकल्पों को तजके।।
जो मन वायू से अचल एक, चिन्मय में प्रमुदित हो तिष्ठें।
वे सर्व परिग्रह रहित मुनी, निष्कंप अचल इव जयवंते।।१।।
मन का व्यापार रोक इंद्रिय, विषयों को जीत धैर्यपूर्वक।
उच्छ्वासगती संकोचित कर, सूने नग आदिक में विधिवत्।।
पर्यंकासन से मुक्ति हेतु, मैं कब अन्तर्मुख होऊँगा।
चेतन आत्मा में रत होकर, निज में कब स्थित होऊँगा।।२।।
प्राप्ती स्वतत्त्व की होने पर, धूली धूसरित वस्त्र विरहित।
पर्यंकासन में शांतचित्त, निर्वचन निमीलित नेत्र सहित।।
जब पत्थर में उत्कीर्ण मूर्ति, सम समझ मुझे वन के मृगगण।
यदि देखें विस्मय हो तब ही, हो पुण्यवान मुझ जैसा जन।।३।।
हो किसी शून्य मठ में निवास, यदि मेरे वस्त्र दिशा ही हों।
उन्नत धन हो सन्तोष क्षमा, भार्या औ तप ही भोजन हो।।
सब जीवों से मैत्री सुतत्त्व-चिंतन सुख हो नित पुन: कहो।
अतिशांत मुझे क्या नहीं? अत: पर से किंचित् नहिं कार्य अहो।।४।।
सुकृत से उत्तम कुल में लेकर जन्म श्रेष्ठ तनु श्रुत पढ़कर ।
वैराग्य पाय शुचि तप करते, वे जग में एक महाकृतिवर।।
यदि वे ही गर्वरहित साधू, जन ध्यानामृत को पीते हैं।
समझो तब स्वर्ण महल ऊपर, वे मणिमय कलश चढ़ाते हैं।।५।।
ग्रीषम ऋतु पर्वत चोटी पर, वर्षा ऋतु में तरु के नीचे।
अति शीत तुषार समय बाहर, चौपथ में जो स्थित होते।।
उन ध्यानप्रशांतात्मक यथोक्त, तपयुत मुनियों के मारग में।
मैं शांतचित्त संचरण करूँ, वह दिन कब आएगा प्रभु! मे।।६।।
यदि शिर पर वङ्का गिरे भी या, त्रिभुवन में अग्नी लग जावे।
नहिं किंचित विकृती हो जिनके, चहे प्राण भले ही नश जावें।।
अद्भुत तेजो नित शांति धन्य, किन ही को ऐसा श्रेष्ठ ध्यान।
अति निश्चल मन की प्रवृत्ति रोक, होता विशेष जब भेदज्ञान।।७।।
जिन यति ने परम ज्योति निरुपाधिक ‘अहं’ शब्द से वाच्य श्रेष्ठ।
निज तत्त्व समझ आश्रय लीना, जिनका स्वतत्त्व ही भवन श्रेष्ठ।।
वह ही शय्या वह ही संपत्, वह सुख वह वृत्ति वही वल्लभ।
वह अखिल श्रेष्ठ वस्तू साधक, वे यति हों हमको शांतिप्रद।।८।।
चिच्चेतन आनंदी श्रीमन्, मुझ पद्मनंदि से यह विरचित।
पापारिक्षयंकर राज्यश्री, औ स्वर्ग मोक्ष लक्ष्मी फलप्रद।।
जो यतीभावनाष्टक भविजन, भक्त्या त्रिसमय में पढ़ते हैं।
इस जग में उस पुण्यात्मा के, क्या-क्या वांछित नहिं फलते हैं।।९।।
-दोहा-
पद्मनंदि यतिवर रचित, यतीभावना सार।
‘ज्ञानमती’ वर आर्यिका, किया पद्य सुखकार।।१०।।
पढ़ो सुनो भवि भाव से, धरो कंठ में नित्त।
ज्ञान विराग निधी मिले, क्रम से निज संपत्ति।।११।।