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भगवान ऋषभदेव वन्दना
January 18, 2020
कविताएँ
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श्री ऋषभदेव वन्दना
गीता छंद
हे आदिब्रह्मा! युगपुरुष! पुरुदेव! युगस्रष्टा तुम्हीं।
युग आदि में इस कर्मभूमी, के प्रभो! कर्ता तुम्हीं।।
तुम ही प्रजापतिनाथ! मुक्ती के विधाता हो तुम्हीं।
मैं भक्ति से वंदन करूं, मन वचन तन से नित यहीं।।१।।
शंभु छंद
श्री वृषभसेन आदिक चौरासी, गणधर मुनि चौरासि सहस।
ब्राह्मी गणिनी त्रय लाख पचास, हजार आर्यिका व्रतसंयुत।।
त्रय लाख सुश्रावक पाँच लाख, श्राविका प्रभू का चउ संघ था।
आयू चौरासी लाख पूर्व, वत्सर व पाँच सौ धनु तनु था।।२।।
अनंग शेखर छंद
जयो जिनेन्द्र! आपके महान दिव्य ज्ञान में, त्रिलोक और त्रिकाल एक साथ भासते रहे।
जयो जिनेन्द्र! आपका अपूर्व तेज देखके, असंख्य सूर्य और चंद्रमा भि लाजते रहे।।
जयो जिनेन्द्र! आपकी ध्वनी अनच्छरी खिरे, तथापि संख्य भाषियों को बोध है करा रही।
जयो जिनेन्द्र! आपका अचिन्त्य ये महात्म्य देख, सुभक्ति से प्रजा समस्त आप आप आ रही।।३।।
जिनेश! आपकी सभा असंख्य जीव से भरी, अनंत वैभवों समेत भव्य चित्त मोहती।
जिनेश! आपके समीप साधु वृंद औ गणीन्द्र, केवली मुनीन्द्र और आर्यिकायें शोभतीं।।
सुरेन्द्र देवियों की टोलियाँ असंख्य आ रही, खगेश्वरों की पक्तियाँ अनेक गीत गा रहीं।
सुभूमि गोचरी मनुष्य नारियाँ तमाम हैं, पशू तथैव पक्षियों कि टोलियाँ भी आ रहीं।।४।।
सुबारहों सभा स्वकीय ही स्वकीय में रहें, असंख्य भव्य बैठ के जिनेश देशना सुनें।
सुतत्त्व सात नौ पदार्थ पाँच अस्तिकाय और, द्रव्य छह स्वरूप को भले प्रकार से गुनें।।
निजात्म तत्त्व को संभाल तीन रत्न से निहाल, बार-बार भक्ति से मुनीश हाथ जोड़ते।
अनंत सौख्य में निमित्त आपको विचार के, अनंत दु:ख हेतु जान कर्मबंध तोड़ते।।५।।
स्वमोह बेल को उखाड़ मृत्युमल्ल को पछाड़, मुक्ति अंगना निमित्त लोक शीश जा बसें।
प्रसाद से हि आपके अनंत भव्य जीव राशि, आपके समान होय आप पास आ लसें।।
असंख्य जीव मात्र दृष्टि समीचीन पायके, अनंतकाल रूप पंच परावर्त मेटते।
सुभक्ति के प्रभाव से असंख्य कर्म निर्जरा, करें अनंत शुद्धि से निजात्म सौख्य सेवते।।६।।
दोहा
तीर्थंकर गुण रत्न को, गिनत न पावें पार।
तीन रत्न के हेतु मैं, नमूँ अनंतों बार।।७।।
वृषभ चिह्न स्वर्णिम तनू, प्रथम तीर्थकर आप।
‘ज्ञानमती’ सुख शांति दे, करो हमें निष्पाप।।८।।
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