भगवान पार्श्वनाथ का जीवन दर्शन
भगवान पार्श्वनाथ का जीवन दर्शन…… जन्मभूमि-वाराणसी (उत्तर प्रदेश) पिता-महाराजा अश्वसेन माता-महारानी वामादेवी (ब्राह्मी) वर्ण-क्षत्रिय वंश-उग्रवंश देहवर्ण-मरकतमणि सदृश (हरा) चिन्ह-सर्प आयु-सौ वर्ष …
भगवान पार्श्वनाथ का जीवन दर्शन…… जन्मभूमि-वाराणसी (उत्तर प्रदेश) पिता-महाराजा अश्वसेन माता-महारानी वामादेवी (ब्राह्मी) वर्ण-क्षत्रिय वंश-उग्रवंश देहवर्ण-मरकतमणि सदृश (हरा) चिन्ह-सर्प आयु-सौ वर्ष …
श्री पार्श्व जिन स्तुति (पृथ्वी छंद) सुरासुर – खगेन्द्रवंद्य – चरणाब्जयुग्मं प्रभुं। महामहिम – मोहमल्ल – गजराज – कंठीरवं।। महामहिम – रागभूमिरुह – मूलमुत्पाटनं। स्तवीमि कमठोपसर्गजयि-पार्श्वनाथं जिनं।।१।। देव असुर विद्याधर वन्दित, चरण सरोरुह पार्श्व प्रभो। महा प्रभावी मोहमल्ल, हस्ती के लिए सिंह सम हो।। महिमाशाली राग वृक्ष को, जड़ से कीना उन्मूलन। कमठोपसर्गजयि पारस का,…
श्री पार्श्वजिन स्तोत्र………… स्रग्धरा छंद-(२१ अक्षरी) श्रीमान् पार्श्वो जिनेन्द्र:, परमसुखरसानन्दकंदैकपिंड:। चिच्चैतन्यस्वभावी, भुवि सकलकले:, कुण्डदण्डप्रचण्ड:।। भ्राजिष्णुस्त्वं सहिष्णु:, कमठशठकृतेनोपसर्गस्य जिष्णु:। त्वां भक्त्या नौमि नित्यं, समरसिकमना, मे क्षमारत्नसिद्ध्यै।।१।। मत्तविलासिनी छंद-(२१ अक्षरी) १माधवमास्यसिते द्वितये दिवसे किल गर्भमित: प्रभु:। पौषसुमास्यसितैकयुता दशमीदिवसे जनिमाप स:।। जन्मतिथौ च दिशावसनो नवहस्ततनु: खलु तीर्थकृत्!। शालिनवांकुरसद्द्युतिमान् शतवर्षमितायुरवेत् स मां।।२।। प्रभद्रक छन्द:-(२२ अक्षरी) ध्याननिमग्नपार्श्वमुनिपं, विलोक्य कमठासुर: कुपितवान्।…
श्री पार्श्वजिन स्तुति……. भवसंकट हर्ता पार्श्वनाथ! विघ्नों के संहारक तुम हो। हे महामना हे क्षमाशील! मुझमें भी पूर्ण क्षमा भर दो।। यद्यपि मैंने शिवपथ पाया, पर यह विघ्नों से भरा हुआ। इन विघ्नों को अब दूर करो, सब सिद्धि लहूँ निर्विघ्नतया।।१।। वाराणसि नगरी धन्य हुई, धन धन्य हुए सब नर नारी। हे अश्वसेननंदन२! तुम से,…
श्री पार्श्वनाथ स्तुति: (सप्तविभक्ति समन्वित) श्री पार्श्वनाथतीर्थेश, उपसर्गजयी महान्। पार्श्वनाथं नमन्तीह, भक्ता: कष्टप्रहाणये।।१।। पार्श्वनाथेन सद्भक्ता:, भवन्तीह सहिष्णव:। पार्श्वनाथाय सद्भक्त्या-ऽनन्तानंता नमोऽस्तु मे।।२।। पार्श्वनाथाद् क्षमाभावै:, भक्तोऽभूत् कमठो रिपु:। पार्श्वनाथस्य भक्त्या मे, शक्ति: सर्वंसहा भवेत्।।३।। पार्श्वनाथे मतिर्मे स्यात्, यावत् सिद्धिर्न मे भवेत्। भो: पार्श्वनाथ! मां रक्ष, शरण्य एक एव त्वं।।४।।
भगवान चन्द्रप्रभ का जीवन दर्शन जन्मभूमि-चन्द्रपुरी (जिला-बनारस) उत्तर प्रदेश पिता-महाराजा महासेन माता-महारानी लक्ष्मणा वर्ण-क्षत्रिय वंश-इक्ष्वाकु देहवर्ण-कुंदपुष्प सम श्वेत चिन्ह-चन्द्रमा आयु-दस लाख पूर्व वर्ष अवगाहना-छह सौ हाथ गर्भ-चैत्र कृ. ५ …
श्री चन्द्रप्रभ स्तुति:…… -भुजंगप्रयातं छंद:- मुनीनां मनोवार्धिराकासुधांशु:। मनोभूविजेता मनोध्वांतहारी।। चलच्चित्तसंचारहान्यै सदा तं। मुदा स्तौमि चन्द्रप्रभं चंद्रकांतं।।१।। मुनिमन समुद्र वर्धन को शशि, मदनजयी मन तमहारी। चपलचित्त गति हरन हेतु, चन्द्रप्रभ स्तुति सुखकारी।।१।। भवव्याधिशान्त्यै स सर्वोषधि: स्यात्। सुवैâवल्यबोधाधिनाथ: कलाभृत्।। महामोहनैशांध-कारांशुमाली। श्रितानां यशोवार्धिपूर्णैकचन्द्र:।।२।। भवव्याधिशम को सर्वौषधि, केवलज्ञान के अधिनायक। महामोह निश अंधकार रवि, आश्रित जन यश वर्धनविधु।।२।। शशांकांघ्रिसेव्य:…
श्री चन्द्रप्रभ स्तोत्र….. उपस्थिता छन्द:-(११ अक्षरी) संसार-वने भ्रमता हि देवेट्। लेशोऽपिसुखं नहि लब्धमेव। त्वं वेत्सि च मेऽखिलदु:खमाप्तं, चन्द्रप्रभ! मामवतात्त्वरं वै।।१।। एकरूप छन्द:-(११ अक्षरी) काश्यां चंद्रपुरे सुरत्नवृष्ट्या, पृथ्वी धन्यवती जनाश्च धन्या:। पित्रोर्हर्षमवर्धयन् हि चैत्रे, पंचम्या-मसितेऽवसत् स गर्भे।।२।। इन्द्रवङ्काा छन्द:-(११ अक्षरी) जन्माभिषेक: सुरशैलमूर्घ्नि, जात: प्रभोश्चन्द्रजिनस्य यस्यां। सैकादशी मे भव पौषकृष्णा, सू: लक्ष्मणा मंगलदायिनी च।।३।। उपेन्द्रवङ्काा छन्द:-(११ अक्षरी)…
श्री चन्द्रप्रभजिन स्तुति….. भव वन में घूम रहा अब तक, किंचित् भी सुख नहिं पाया हूँ। प्रभु तुम सब दु:ख के ज्ञाता हो, अतएव शरण में आया हूँ।। सुरपति गणपति नरपति नमते, तव गुणमणि की बहुभक्ति लिए। मैं भी नत हूँ तव चरणों में, अब मेरी भी रक्षा करिये।।१।। काशी में चन्द्रपुरी सुन्दर, रत्नों की…
श्री चन्द्रप्रभ स्तुति: (सप्तविभक्ति समन्वित) श्रीचन्द्रप्रभदेवस्त्वं, चंद्रकांतिसमप्रभ:। श्रीचन्द्रप्रभदेवं त्वां, नमन्ति स्वसुखाप्तये।।१।। श्रीचन्द्रप्रभदेवेन, मोहध्वांतमपाकृतं। श्रीचन्द्रप्रभदेवाय, नम: स्वात्मगुणाप्तये।।२।। श्रीचन्द्रप्रभदेवात् हि, ज्ञानदीधितय: स्फुटा:। श्रीचन्द्र्रप्रभदेवस्य, भासंते भाक्तिका: भुवि।।३।। श्रीचन्द्रप्रभदेवेऽहं, दधे नित्यं स्वमानसं। श्रीचन्द्रप्रभदेव! त्वं, मह्यं देहि स्वसंपदं।।४।। सम्यग्ज्ञानमती प्राप्त्यै, केवलं त्वत्पदद्वयम्। आश्रयामि स्मरामि च, संततं भक्तिभावत:।।५।।