प्रथम दिवस का अर्घ्य (1) सदी बीसवीं की पहली तुम बालयोगिनी हो माता । बाराबंकी शहर सन् बावन से जुड़ा संयम नाता ॥ वहाँ के अतिशयकारी चन्द्रप्रभ जिनवर को है वन्दन । मैना से जो बनीं ज्ञानमति गणिनी माता को बन्दन ॥ दोहा अर्घ्य समर्पण कर नमूँ, चन्द्रप्रभ जिनराज । पुनः अर्घ्य अर्पण करूँ, ज्ञानमती…