रात्रिक (दैवसिक) प्रतिक्रमण अर्थसहित
रात्रिक (दैवसिक) प्रतिक्रमण प्रतिज्ञा सूत्र जीवे प्रमाद-जनिताः प्रचुराः प्रदोषाः, यस्मात् प्रतिक्रमणतः प्रलयं प्रयान्ति । तस्मात् तदर्थ-ममलं, मुनि-बोधनार्थ, वक्ष्ये विचित्र-भव-कर्म-विशोधनार्थम् ।। १ ।। अन्वयार्थ- (यस्मात्) जिस (प्रतिक्रमणतः) प्रतिक्रमण से (जीवे) जीव में (प्रमाद-जनिताः) प्रमाद से उत्पन्न (प्रचुराः) अनेक (प्रदोषाः) दोष (प्रलयं) क्षय को (प्रयान्ति) प्राप्त होते हैं। (तस्मात्) इसलिये (तदर्थं) उनके लिये (विचित्र-भव-कर्म विशोधनार्थ) अनेक भवों…