दिव्यध्वनि स्तोत्र
दिव्यध्वनि स्तोत्र —गीता छंद- जिनदेव के मुख से खिरी, दिव्यध्वनी अनअक्षरी। गणधर ग्रहण कर द्वादशांगी, ग्रंथमय रचनाकरी।। उन अंग पूरब शास्त्र के ही, अंश ये सब शास्त्र हैं। उस जैनवाणी को नमूँ, जो ज्ञान अमृत सार है।।१।। -दोहा- द्वादशांग हे वाङ्मय! श्रुतज्ञानामृतसिंधु। वंदूं मन वच काय से, तरूँ शीघ्र भवसिंधु।।२।। -शंभु छंद- जय जय जिनवर…