श्रुतावतार
“…श्रुतावतार…” मंगलाचरण श्रुतपंचमी श्रुतावतार प्रशस्ति: सरस्वती स्तोत्र
सरस्वती स्तोत्र…. (प्रतिष्ठातिलक ग्रंथ से) बारह अंगंगिज्जा, दंसणतिलया चरित्तवत्थहरा। चोद्दसपुव्वाहरणा, ठावे दव्वाय सुयदेवी।।१।। आचारशिरसं सूत्र-कृतवक्त्रां सुकंठिकाम्। स्थानेन समवायांग-व्याख्याप्रज्ञप्तिदोर्लताम् ।।२।। वाग्देवतां ज्ञातृकथो-पासकाध्ययनस्तनीम्। अंतकृद्दशसन्नाभि-मनुत्तरदशांगत: ।।३।। सुनितंबां सुजघनां, प्रश्नव्याकरणश्रुतात्। विपाकसूत्रदृग्वाद-चरणां चरणांबराम् ।।४।। सम्यक्त्वतिलकां पूर्व-चतुर्दशविभूषणाम्। तावत्प्रकीर्णकोदीर्ण-चारुपत्रांकुरश्रियम्।।५।। आप्तदृष्टप्रवाहौघ-द्रव्यभावाधिदेवताम् । परब्रह्मपथादृप्तां, स्यादुक्तिं भुक्तिमुक्तिदाम् ।।६।। निर्मूलमोहतिमिरक्षपणैकदक्षं, न्यक्षेण सर्वजगदुज्ज्वलनैकतानम् । सोषेस्व चिन्मयमहो जिनवाणि ! नूनं, प्राचीमतो जयसि देवि ! तदल्पसूतिम् ।।७।। आभवादपि दुरासदमेव,…
“…श्रुतावतार प्रशस्ति:…” महावीरो जगत्स्वामी, सातिशायीति विश्रुत:। तस्मै नमोऽस्तु मे भक्त्या, सर्वकार्यस्य सिद्धये।।१।। अष्टादशमहाभाषा, लघुसप्तशतान्विता। सर्वभाषामयी वाणी, तां नुमो वाग्विशुद्धये।।२।। सर्वे ऋषभसेनादि-गौतमान्त्यगणेशिन:। साधून् वीरांगजान्तांश्च, नौमि चारित्रपूर्त्तये।।३।। श्रीधरसेनमाचार्यं श्रुताब्धे: पारगं नुम:। पुष्पदन्तगुरुं सूरिं, भूतबलिमपि स्तुवे।।४।। वीरसेनादिसूरिभ्यो, नमो भक्त्या पुन: पुन:। ग्रन्थ टीकादिकर्तृभ्यो, नमो ज्ञानर्द्धिलब्धये।।५।। वन्देऽहं ग्रन्थकर्तार-मिंद्रनंदिमुनीश्वरम्। कुंदकुंदान्वयान् सर्वान्, मूलसंघे स्थितान् स्तुवे।।६।। वन्दे ब्राह्मीगणिन्यादि-सर्वश्रीसंयतान्त्यजा:। एकादशांगज्ञात्रीश्च, मूलोत्तरगुणाप्तये।।७।। नवखपचद्वयंकेऽस्मिन्१, वीराब्दे…
श्रुतपंचमी…… वैशाख सुदी दशमी के दिन भगवान् महावीर को केवलज्ञान प्रगट हुआ था, किन्तु गणधर के अभाव में छ्यासठ दिन तक उनकी दिव्यध्वनि नहीं खिरी। उस समय इन्द्र ने बुद्धिबल से इन्द्रभूति नामा ब्राह्मण को वहाँ उपस्थित किया। गौतम गोत्रीय इन्द्रभूति ने पाँच-पाँच सौ शिष्यों के साथ अपने भाई अग्निभूति और वायुभूति के साथ तथा…
देववंदना अपरनाम सामायिक…….. १. मंगलाचरण २. कृतिकर्म विधि ३. कृतिकर्म का लक्षण ४. कृतिकर्म के भेद ५. सामायिक कब और कैसे करें ? ६. वन्दना योग्य मुद्रा ७. अथ दृष्टाष्टक स्तोत्र ८. ईर्यापथ शुद्धि (संस्कृत) ९. देववन्दना (सामायिक) १०. अथ चतुर्दिग्वंदना ११. गुरुवंदना कब और कैसे? १२. आचार्य वंदना १३. ईर्यापथ शुद्धि भक्ति (हिन्दी पद्यानुवाद)…
अथ देववंदना विधि (सामायिकभाष्य ग्रन्थ से) ईर्यापथशुद्धि…. पडिक्कमामि भंते! इरियावहियाए विराहणाए अणागुत्ते अइगमणे, णिग्गमणे, ठाणे, गमणे, चंकमणे, पाणुग्गमणे, बीजुग्गमणे, हरिदुग्गमणे, उच्चार-पस्सवण-खेल-सिंहाणय-वियडिय पइट्ठावणियाए, जे जीवा एइंदिया वा, बेइंदिया वा, तेइंदिया वा, चउिंरदिया वा, पंचिंदिया वा, णोल्लिदा वा, पेल्लिदा वा, संघट्टिदा वा, संघादिदा वा, उद्दाविदा वा, परिदाविदा वा, किरिंच्छिदा वा, लेस्सिदा वा, छिंदिदा वा, भिंदिदा वा, ठाणदो…
देववन्दना-प्रयोगानुपूर्वी (सामायिक विधि) देववन्दना के लिये श्रीजिनमंदिर को जावें, वहाँ उचित स्थान में बैठकर दोनों हाथों और दोनों पैरों को धोवें । अनन्तर- ‘‘नि:सही नि:सही नि:सही’’ ऐसा तीन बार उच्चारण कर चैत्यालय में प्रवेश करें वहां जिनेन्द्रदेव के मुख का अवलोकन कर तीन बार प्रणाम करें । अनन्तर ‘‘दृष्टं जिनेन्द्रभवनं भवतापहारि’’ इत्यादि दर्शन-स्तोत्र को वन्दना…
देववन्दना प्रयोग विधि त्रिसन्ध्यं वन्दने युञ्ज्याश्चैत्यपंचगुरुस्तुती। प्रियभक्तिं बृहद्भक्तिष्वन्ते दोषविशुद्धये ।।१।। तथा- जिणदेववन्दणाए चेदियभत्ती य पञ्चगुरुभत्ती ।।१/२।। ऊनाधिक्यविशुद्ध्यर्थं सर्वत्र प्रियभक्तिका ।।१/२।। तीनों सन्ध्या सम्बन्धी जिनवन्दना में चैत्यभक्ति और पञ्चगुरुभक्ति तथा सभी बृहद्भक्तियों के अन्त में वन्दनापाठ की हीनाधिकता रूप दोषों की विशुद्धि के लिये प्रियभक्ति-समाधिभक्ति करना चाहिये । इस देववन्दना में छह प्रकार का कृतिकर्म भी…
नति….. द्वे साम्यस्य स्तुतेश्चादौ शरीरनमनान्नती । वन्दनाद्यन्तयो: केश्रीन्निविश्य नमनान्मते ।।१७।। अर्थात्-सामायिकदण्डक और स्तुतिदण्डक के पहले भूमिस्पर्शरूप पंचांगप्रणाम करने से दो नति की जाती हैं। कोई-कोई आचार्य वन्दना के पहले और पीछे बैठकर प्रणाम करने से दो नती मानते हैें। भावार्थ-सामायिकदण्डक के पहले और चतुर्विंशतिस्तवदण्डक के पहले दो बार पंचांगप्रणाम किया जाता है इसलिये दो नती…
शिर-लक्षण….. प्रत्यावर्तत्रयं भक्तया नन्नमत् क्रियते शिर:। यत्पाणिकुङ्भलाज्र् तत् क्रियायां स्याच्चतु: शिर: ।।१५।। अर्थात्-तीन तीन आवर्त के प्रति जो भक्तिपूर्वक शिर झुकाना है वह चार शिर है। मुकुलित हाथ इसका चिन्ह है और ये चार शिर चैत्यभक्त्यादि कायोत्सर्ग के समय किये जाते हैं। भावार्थ-सामायिकदण्डक के आदि में तीन आवर्त कर शिर झुकाना। अन्त में तीन आवर्त…