वैराग्य भावना-वङ्कानाभि चक्रवर्ती की
वैराग्य भावना-वङ्कानाभि चक्रवर्ती की -दोहा- बीज राख फल भोगवै, ज्यों किसान जग माहिं। त्यों चक्री नृप सुख करे, धर्म विसारै नाहिं।।१।। -जोगीरासा वा नरेन्द्र छंद- इहविधि राज करै नरनायक, भोगै पुण्य विशालो। सुखसागरमें रमत निरंतर, जात न जान्यो कालो।। एक दिवस शुभ कर्म-संजोगे, क्षेमंकर मुनि वंदे। देख शिरीगुरु के पदपंकज, लोचन अलि आनंदे।।२।। तीन प्रदक्षिण…