देशव्रतोद्योतन
देशव्रतोद्योतन -शार्दूलविक्रीडित- बाह्याभ्यन्तरसङ्गवर्जनतया ध्यानेन शुक्लेन य: कृत्वा कर्मचतुष्टयक्षयमगात्सर्वज्ञतां निश्चिताम्। तेनोक्तानि वचांसि धर्मकथने सत्यानि नान्यानि तद्भ्राम्यत्यत्र मतिस्तु यस्य य महापापी न भव्योऽथवा।।१।। अर्थ —समस्त बाह्य तथा अभ्यंतर परिग्रह को छोड़कर और शुक्लध्यान से चार घातिया कर्मों को नाशकर जिसने सर्वज्ञपना प्राप्त कर लिया है उसी सर्वज्ञदेव के वचन, धर्म के निरूपण करने में सत्य हैं, किंतु…