प्रथम परिच्छेद का सार
“…प्रथम परिच्छेद का सार…” (कारिका १ से २३ तक) श्रोतव्याष्टसहस्री श्रुतै: किमन्यै: सहस्रसंख्यानै:। विज्ञायेत ययैव स्वसमयपरसमयसद्भाव:।। श्री विद्यानंद स्वामी का यह कहना है कि एक अष्टसहस्री को ही सुनना चाहिए। अन्य हजारों ग्रन्थों को सुनने से क्या प्रयोजन है ? क्योंकि इस एक अष्टसहस्री ग्रंथ के द्वारा ही स्वसमय और परसमय का स्वरूप जान लिया…