परम आलोचना अधिकार
परम आलोचना अधिकार स्रग्धरा– आलोच्यालोच्य नित्यं सुकृतमसुकृतं घोरसंसारमूलं शुद्धात्मानं निरुपधिगुणं चात्मनैवावलम्बे। पश्चादुच्चै: प्रकृतिमखिलां द्रव्यकर्मस्वरूपां नीत्वा नाशं सहजविलसद्बोधलक्ष्मीं व्रजामि।।१५२।। अर्थ-घोर संसार के लिये मूल ऐसे सुकृत और दुष्कृत की नित्य ही बार-बार आलोचना करके उपाधि रहित गुणों से युक्त ऐसी अपनी शुद्ध आत्मा का अपनी आत्मा के द्वारा ही मैं अवलंबन लेता हूँ। अनंतर द्रव्यकर्म स्वरूप…