नवमें परिच्छेद का सार
नवमें परिच्छेद का सार पुण्य और पाप के एकांत का निराकरण एवं स्याद्वाद की सिद्धि (कारिका ९२ से ९५ तक) भाग्य दो प्रकार का है-एक पुण्य और दूसरा पाप। वही प्राणियों के सुख और दु:ख का कारण है। ‘‘सद्वेद्यशुभायुर्नामगोत्राणि पुण्यं, इतरत्पापं’’ सातावेदनीय, शुभ आयु, शुभ नाम और उच्च गोत्र, ये पुण्य रूप हैं और इनसे…