अर्घावली
अर्घावली द्रव्य आठों जु लीना है, अर्घ कर में नवीना है। पूजतां पाप छीना है, भानुमल जोर कीना है।। दीप अढ़ाई सरस राजै, क्षेत्र दश ता विषै छाजै। सातशत बीस जिनराजै, पूजतां पाप सब भाजै।।१।। ॐ ह्रीं पाँच भरत, पाँच ऐरावत, दश क्षेत्र के विषै तीस चौबीसी के सात सौ बीस जिनेन्द्रेभ्योऽर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।।१।। -छन्द-घत्तानन्द-…