अथ १०८ अर्घ्य
अथ १०८ अर्घ्य… —दोहा— मल्लिनाथ भगवंत को, जजत मिले शिवपंथ। बालब्रह्मचारी नमूं, पुष्पांजलि विकिरंत।।१।। ।।अथ मंडलस्योपरि पुष्पांजलिं क्षिपेत्।। —सोरठा— दिव्यध्वनी के नाथ, अठरह महभाषा कही। लघू सात सौ भाष, मैं पूूजूँ वसु अर्घ्य ले।।१।। ॐ ह्रीं दिव्यभाषापतये श्रीमल्लिनाथतीर्थंकराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा। अतिशय सुंदर आप, अत: ‘दिव्य’ गणधर कहे। नशें कर्म अभिशाप, पूजत हो निजसंपदा।।२।। ॐ…