समवसरण रचना
समवसरण रचना -गणिनी ज्ञानमती नमः श्रीवर्धमानाय, निर्धूतकलिलात्मने। सालोकानां त्रिलोकानां, यद्विद्या दर्पणायते।।१।। तीर्थंकर भगवन्तों को केवलज्ञान प्रगट होते ही, पृथ्वीतल से पाँच हजार धनुष-बीस हजार हाथ प्रमाण ऊपर आकाश में अधर पहुँच जाते हैं। उसी समय इंद्रों के आसन कंपित होते ही इन्द्र की आज्ञा से कुबेर अर्धनिमिष में आकाश में अधर ही समवसरण की रचना…