जय परायज :!
[[ श्रेणी:जैन_सूक्ति_भण्डार ]] [[ श्रेणी:शब्दकोष ]] == जय परायज : == स वोरिए परायिणति, अवीरिए परायिज्जति। —भगवती सूत्र : १-८ शक्तिशाली (वीर्यवान्) जीतता है और शक्तिहीन (निर्वीर्य) पराजित हो जाता है।
[[ श्रेणी:जैन_सूक्ति_भण्डार ]] [[ श्रेणी:शब्दकोष ]] == जय परायज : == स वोरिए परायिणति, अवीरिए परायिज्जति। —भगवती सूत्र : १-८ शक्तिशाली (वीर्यवान्) जीतता है और शक्तिहीन (निर्वीर्य) पराजित हो जाता है।
[[ श्रेणी:जैन_सूक्ति_भण्डार ]] [[ श्रेणी:शब्दकोष ]] == धर्म : == धम्मो वत्थुसहावो। —कर्तिकेयानुप्रेक्षा : ४७८ वस्तु का अपना स्वभाव ही उसका धर्म है। धर्मो बंधुश्च मित्रञ्च धर्मोऽयं गुरुरंगिनाम्। तस्माद् धर्मे मिंत धत्स्व स्वर्गमोक्षसुखदायिनि।। —आदिपुराण : १०-१०९ धर्म ही मनुष्य का सच्चा बंधु है, मित्र है और गुरु है। इसलिए स्वर्ग एवं मोक्ष के सुख देने…
[[ श्रेणी:जैन_सूक्ति_भण्डार ]] [[ श्रेणी:शब्दकोष ]] == महाव्रत : == अहिंसा सत्यं चास्तेनवंâ च, ततश्चाब्रह्मापरिग्रहं च। प्रतिपद्य पंचमहाव्रतानि, चरति धर्मं जिनदेशितं विद:।। —समणसुत्त : ३६४ अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह, ये पांच महाव्रत ग्रहण कर श्रमण जिनदेशना के अनुसार धर्म का आचरण करे।
[[ श्रेणी:जैन_सूक्ति_भण्डार ]] [[ श्रेणी:शब्दकोष ]] == रत्नत्रय : == सम्मद्दंसंण—णाणं चरणं मुक्खस्स कारणं जाणे। —द्रव्यसंग्रह : ३९ सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान एवं सम्यग्चारित्र—यही रत्नत्रय मोक्ष का साधन है। तत्त्वरुचि: सम्यक्त्वं, तत्त्व—प्रख्यापकं भवेत् ज्ञानम्। पापक्रियानिवृत्तिश्चारित्रमुक्तं जिनेन्द्रेण।। —ज्ञानार्णव : ९१ जिनेन्द्र भगवान ने तत्त्वविषयक रुचि को सम्यग्दर्शन, तत्त्वविषयक ज्ञान को सम्यग्ज्ञान और पापमय क्रिया से निवृत्ति को सम्यक्…
[[ श्रेणी:जैन_सूक्ति_भण्डार ]] [[ श्रेणी:शब्दकोष ]] == व्यसन : == जूयं मज्जं मंसं वेसा पारद्धि—चोर—परयारं। दुग्गइगमणस्सेदाणि हेउभूदाणि पावाणि।। —वसुनंदीश्रावकाचार : ५९ जुआ खेलना, मदिरापान, मांसाहार, वेश्यागमन, शिकार खेलना, चोरी करना और परस्त्रीगमन करना, ये पाप की ओर तथा दुर्गति में ले जाने के कारण हुआ करते हैं।
[[ श्रेणी:जैन_सूक्ति_भण्डार ]] [[ श्रेणी:शब्दकोष ]] == श्रावक-धर्म: == सहसाभ्याख्यानं, रहसा च स्वदारमन्त्र भेदं च। मृषोपदेशं कूटलेखकरणं च वर्जयेत्।। —समणसुत्त : ३१२ (साथ ही साथ) सत्य—अणुव्रती बिना सोचे—समझे न तो कोई बात करता है, न किसी का रहस्योद्घाटन करता है, न अपनी पत्नी की कोई बात मित्रों आदि में प्रकट करता है, न मिथ्या (अहितकारी)…
[[ श्रेणी:जैन_सूक्ति_भण्डार ]] [[ श्रेणी:शब्दकोष ]] == सत्संग : == धुनोति दवयुं स्वान्तात्तनोत्यानंदथुं परम्। धिनोति च मनोवृत्तिमहो साधु—समागम:।। —आदिपुराण : ९-१६० साधु पुरुष का समागम मन से संताप को दूर करता है, आनन्द की वृद्धि करता है और चित्तवृत्ति को संतोष देता है।
[[ श्रेणी:जैन_सूक्ति_भण्डार ]] [[ श्रेणी:शब्दकोष ]] == सम्यग्दृष्टि : == भूयत्थमस्सिदो खलु, सम्माइट्ठी हवइ जीवो। —समयसार : ११ जो भूतार्थ अर्थात् सत्यार्थ शुद्ध दृष्टि का अवलम्बन करता है, वही सम्यग्दृष्टि है। जं कुणदि सम्मदिट्ठी, तं सव्वं णिज्जरणिमित्तं। —समयसार : १९३ सम्यग्दृष्टि आत्मा जो कुछ भी करता है, वह उसके कर्मों की निर्जरा के लिए ही…
[[जैन_सूक्ति_भण्डार ]] [[ श्रेणी:शब्दकोष ]] == कवि : == परेषां दूषणाज्जातु न बिभेति कवीश्वरा:। किमुलूकभयाद् धुन्वन् ध्वान्तं नोदेति भानुमान्।। —आदिपुराण : १-७५ दूसरों के भय से कविजन (विद्वान) कभी डरते नहीं हैं। क्या उल्लुओं के भय से सूर्य अंधकार का नाश करना छोड़ देता है ?
[[ श्रेणी:जैन_सूक्ति_भण्डार ]] [[ श्रेणी:शब्दकोष ]] == जयश्री : == सव्वायरेण रक्खह तं पुरिसं जत्थ जयसिरी वसइ। अत्थमियम्मि मियंके तारेहिं न कीरए जोण्हा।। —गाहारयण कोष : ७८० जिस पुरुष में जयश्री निवास करती है, उसका सब प्रकार आदर के साथ रक्षण करो क्योंकि चन्द्र के अस्त होने पर तारों से प्रकाश नहीं होता। सुच्चिय सूरो…