[[श्रेणी:मध्यलोक_के_जिनमंदिर]] == नरलोक के अकृत्रिम जिनचैत्यालयों की संख्या अथ नरलोकजिनगृहाणि कुत्र कुत्र तिष्ठन्ति इत्युत्तेक़ आह— मंदरकुलवक्खारिसुमणुसुत्तररुप्पजंबुसालिसु। सीदी तीसं तु सयं चउ चउ सत्तरिसयं दुपणं।।५६२।। मन्दरकुलवक्षारेषु मानुषोत्तररूप्यजम्बूशाल्मलिषु। अशीतिः त्रिंशत् तु शतं चत्वारि चत्वारि सप्ततिशतं द्विपञ्च।।५६२।। मंदर। मन्दरेषु ५ कुलपर्वतेषु ३० वक्षारेषु १०० इष्वाकारेषु ४ मानुषोत्तरे १ विजयार्धेषु १७० जम्बूवृक्षेषु ५ शाल्मलीवृक्षेषु ५ यथासंख्यं जिनगृहाण्यशीति ८० त्रिंशत्…
श्रीमद् भागवत में भ० ऋशभदेव महर्शि वेद व्यास जी की सनातन वैदिक धर्म परम्परा मान्य प्रमाणित कृति में भगवान ऋशभदेव को आठवाँ अवतार निरूपित किया गया है। यथा – अश्ठमे मेरूदेव्यां तु नाभेर्जात उरुक्रम :। दर्षयन् वत्र्म धीराणां सर्वाश्रमनमस्कृतम्।। प्रथम स्कन्ध अ. 3/10 राजा नाभि के पत्नी मेरुदेवी (मरुदेवी) के गर्भ से ऋशभदेव के रूप…
सती द्रौपदी हस्तिनापुर में पांडवों का शासन चल रहा था। प्रजा के लोग दुर्योधन आदि कौरवों के दुव्र्यवहार को भी भुला चुके थे। उस सुखद प्रसंग में नारद ऋषि यत्र-तत्र विचरण करते हुए वहाँ पर आ गये। पाँचों पांडवों से मिलकर प्रसन्न हुए। पांडवों ने भी उनका बहुत ही आदर-सम्मान किया। अनन्तर नारदजी द्रौपदी के…
धर्मचक्र से सदाचार का प्रवर्तन होता है —विद्यावारिधि डॉ. महेन्द्र सागर प्रचण्डिया यूनानी सम्राट सिकन्दर के मन में विश्व विजेता बनने की लालसा उत्पन्न हुई। अपनी कामना पूर्ण करने के लिए वह एक चमत्कारी योगी के आश्रम में पहुँचा। यथायोग्य सेवा—सुश्रषा कर उसने योगी का प्रसन्न किया। योगी ने सिकन्दर के विश्व—विजयी होने के मनोरथ…
अनेकांत माधुरी-बहन श्रीकांता! आप स्वाध्याय खूब करती हैं बताइए, अनेकांत किसे कहते हैं? श्रीकांता-बहन! जैन धर्म का मूल सिद्धान्त अनेकांत ही है, इसलिए इसको समझना बहुत ही जरूरी है, सुनो, मैंने जितना समझा है, उतना तुम्हें समझाती हूँ। प्रत्येक वस्तु में अनेकों धर्म हैं। ‘‘अनैक अंता:धर्मा: यस्मिन् असौ अनेकांता:’’ जिसमें अनेकों अंत-धर्म पाये जाते हैं…
भावनिर्जरा-द्रव्यनिर्जरा जिन परिणामों से यथाकाल, फल देकर पुद्गल कर्म झड़े। और जिन भावों से तप द्वारा, फल दें अकाल में कर्म झड़ें।। बस भावनिर्जरा कहलाता, है भाव वही ऐसा जानो। है द्रव्यनिर्जरा कर्मों का, झड़ना यह बात सही मानो।।३६।। यथासमय-उदय काल में फल देकर अथवा तप के द्वारा आत्मा के जिन भावों से कर्म झड़…
[[श्रेणी:मध्यलोक_के_जिनमंदिर]] == नंदीश्वरद्वीप के ५२ जिनमंदिर एवं द्विगुणाद्विगुणावलयविष्कम्भेषु द्वीपसमुद्रेषु गतेष्वष्टमो नन्दीश्वरो द्वीपः। तस्य वलयविष्कम्भः कोटिशतं त्रिषष्टिकोट्यः चतुरशीतिश्च योजनशतसहस्राणि। तत्परिधिः द्वे कोटिसहस्रे द्विसप्ततिकोटयः त्रयस्ंित्रच्छतसहस्राणि चतुःपञ्चाशतसहस्राण्येकशतं नवतियोजनानि गव्यूतं च साधिकम्। तद्बहुमध्यदेशभाविनश्चतसृषु दिक्षु चत्वारोऽञ्जनगिरायः योजनसहस्रावगाहाश्चतुरशीतियोजनसहस्रोत्सेधाः मूलमध्याग्रेषूत्सेधसमायामविष्कम्भाः पटहाकाराः। तेषां चतसृषु दिक्षु तिर्यगेवंâ योजनशतसहस्रमतीत्य प्रत्येवंâ चतस्रो वाप्यो भवन्ति। तत्र पौरस्त्याञ्जनगिरेः नन्दा-नन्दवती-नन्दोत्त्रा-नन्दिघोषासंज्ञा योजनसहस्रावगाहा योजनशतसहस्रायामविष्कम्भाश्च-तुष्कोणा मत्स्य कच्छपादिजलचरविरहिताः पद्मोत्पलादिजलरुहकुसुमञ्छादितस्फटिकमणिस्वच्छगम्भीर नीराः। प्राच्यां दिशि नन्दा…
क्या राजा सोमप्रभ एवं श्रेयांस श्री कामदेव बाहुबली के पुत्र थे ? जरा विचार करें युग की आदि में भगवान ऋषभदेव ने अयोध्या नगरी में जन्म लिया था। माता मरुदेवी एवं पिता नाभिराज ने यौवन अवस्था में भगवान ऋषभदेव का विवाह यशस्वती और सुनन्दा नामक दो कन्याओं के साथ सम्पन्न किया, जिसमें से महारानी यशस्वती…
गुणस्थानसार प्राण प्ररूपणा सार बाह्य उच्छ्वास आदि बाह्य प्राणों से तथा इंद्रियावरण कर्म के क्षयोपशम आदि अभ्यन्तर प्राणों से जिनमें जीवितपने का व्यवहार होता है वे जीव हैं अर्थात् जिनके सद्भाव में जीव में जीवितपने का और वियोग होने पर मरणपने का व्यवहार हो, उनको प्राण कहते हैं। पर्याप्ति कारण है आौर प्राण कार्य है।…