जैन धर्म की समाजवादी अर्थव्यवस्था जैन दर्शन निवृत्ति प्रधान है। यद्यपि जैनधर्म का अपरिग्रह का आदर्श सिद्धान्त धन के महत्त्व का विरोधी है। धन—संग्रह मुक्ति में बाधक है। धन के व्यवहार से मोक्ष नहीं मिल सकता है। इसमें आत्यन्तिक सुख नहीं। पुनरपि तीर्थंकरों के जन्म पर उनकी माता द्वारा देखे गये सोलह स्वपनों में एक…
आत्मानुशासन दिगम्बर जैन समाज में प्रचलित आत्मानुशासन नामक महान ग्रंथ आचार्य श्री गुणभद्र स्वामी की अनुपम कृति है। यह ग्रंथ अपने नाम को सार्थक करता हुआ आत्मा पर अनुशासन करने की विद्या सिखाता है। व्यवहारिक जीवन में हम देखते हैं कि जो छात्र/छात्रा, पुत्र-पुत्री आदि अनुशासन में रहकर अपना जीवन व्यतीत करते हैं, वे अपने…
श्रावक के १२ व्रत पाँच अणुव्रत, तीन गुणव्रत और चार शिक्षाव्रत ये बारह व्रत कहलाते हैं। पाँच अणुव्रत का लक्षण बताया जा चुका है। अब यहाँ गुणव्रत और शिक्षाव्रतो को बतलाते हैं। गुणव्रत जो अणुव्रतों को बढ़ाते हैं अथवा उसमें दृढ़ता या मजबूती लाने वाले होते हैं उन्हें गुणव्रत कहते हैं। उनके तीन भेद हैं-दिग्व्रत,…
सोलह कारण भावना प्रस्तुति – गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी श्रेयोमार्गानभिज्ञानिह भवगहने जाज्ज्वलद्दु:खदाव-स्कन्धे चंक्रम्यमाणानतिचकितमिमानुद्धरेर्यं वराकान्।।इत्यारोहत्परानुग्रहरसविलसद्भावनोपात्तपुण्य-प्रक्रान्तैरेव वाक्यै: शिवपथमुचितान् शास्ति योऽर्हन् स नोऽव्यात् ।।१।। अर्थ-इस संसाररूपी भीषण वन में दु:खरूपी दावानल अग्नि अतिशय रूप से जल रही हैं। जिसमें श्रेयोमार्ग-अपने हित के मार्ग से अनभिज्ञ हुए ये बेचारे प्राणी झुलसते हुए अत्यंत भयभीत होकर इधर-उधर भटक…
मार्गणा मार्गणा शब्द का अर्थ है अन्वेषण। जिन भावों के द्वारा अथवा जिन पर्यायों में जीव का अन्वेषण किया जावे उनका नाम ‘मार्गणा’ है। मार्गणा के चौदह भेद-‘गति इन्द्रिय, काय, योग, वेद, कषाय, ज्ञान, संयम, दर्शन, लेश्या, भव्यत्व, सम्यक्त्व, संज्ञा और आहार ये चौदह मार्गणाएं हैं।’’ गति-गति नामकर्म के उदय से होने वाली जीव की…
नयों का वर्णन प्रमाण से जाने हुए पदार्थ के एक देश को ग्रहण करने वाले ज्ञाता के अभिप्राय विशेष को नय१ कहते हैं। नय के नव भेद हैं- द्रव्यार्थिक, पर्यायार्थिक, नैगम, संग्रह, व्यवहार, ऋजुसूत्र, शब्द, समभिरूढ़ और एवंभूत। १. द्रव्य को विषय करने वाला द्रव्यार्थिक नय है। इसके १० भेद हैं-कर्मों की उपाधि से निरपेक्ष…