युगप्रतिक्रमण!
[[श्रेणी:शब्दकोष]] युगप्रतिक्रमण – पंचवर्शीय प्रतिक्रमण, 5 साल में सामूहिक रूप से साधुओ द्वार किया जाने वाला प्रतिक्रमण Yugapratikramana-A religious observance (repentance) to be performed by saints in every 5 year
[[श्रेणी:शब्दकोष]] युगप्रतिक्रमण – पंचवर्शीय प्रतिक्रमण, 5 साल में सामूहिक रूप से साधुओ द्वार किया जाने वाला प्रतिक्रमण Yugapratikramana-A religious observance (repentance) to be performed by saints in every 5 year
[[श्रेणी:शब्दकोष]] प्रज्ञापनी – Pragyaapani. Most convient informatory language (easy preaching). एक भाषा; धर्मोपदेश करना ” यह भाषा अनेक लोगों को उद्देश्य कर कही जाती है “
[[श्रेणी:शब्दकोष]] रात्रिक आलोचना – आलोचना के 7 भेदो में एक भेद, गुरू के समीप रात्रि में हुए दोशो की आलोचना करना। Ratrika Alocana-A type of self criticism, admitting own faults (pertaining to night) before spiritual teacher
[[श्रेणी:शब्दकोष]] रूपानुपात – देषव्रत का एक अतिचार।मर्यादा के बाहर काम करने वालो को निजरूपर दिखाकर अपना प्रयोजन बता देना। Rupanupata-making sign for persons beyond the limit, as the morse code with flags etc. (an infraction of Deshvrat)
[[श्रेणी:शब्दकोष]] भेदसंघात:Association-cum-dissociation related to karmic molecules. भेद अर्थात्स्कन्धों का टूटना एवं संघात होनाअर्थात्भित्र-भित्र परमाणुओं या स्कन्धों से मिलकर स्कंधों की उत्पत्ति होना “
द्रुमसेन Name of a great Acharya possessing knowledge of 11Angas. 11 अंगों के ज्ञाता पाँच आचार्यों में चैथें आचार्य। [[श्रेणी: शब्दकोष ]]
[[श्रेणी:शब्दकोष]] भेद :Difference, type, division, separation, discrimination, disjunction. विरुध धर्मों एवं भित्र-भित्र कारणों काहोना यही भेद है “
द्रव्यस्तव Physical praising, act of eulogy. स्तुति ; शुभ लक्षणों से युक्त 24 तीर्थंकरों के शरीर की छवि का कीर्तन करना। [[श्रेणी: शब्दकोष ]]
[[ श्रेणी:जैन_सूक्ति_भण्डार ]] [[ श्रेणी:शब्दकोष ]] == सम्यक् चारित्र : == सम्यक्त्वरत्नभ्रष्टा, जानन्तो बहुविधानि शास्त्राणि। आराधनाविरहिता, भ्रमन्ति तत्रैव तत्रैव।। —समणसुत्त : २४९ किन्तु सम्यक्त्व रूपी रत्न से शून्य अनेक प्रकार के शास्त्रों के ज्ञाता व्यक्ति भी आराधनाविहीन होने से संसार में अर्थात् नरकादि गतियों में भ्रमण करते रहते हैं। श्रुतज्ञानेऽपि जीवो, वर्तमान: स न प्राप्नोति…