वस्त्ररहित!
[[श्रेणी:शब्दकोष]] वस्त्ररहित – Vastrarahita.: Unclothed, Nacked,Natural form of one. अचेलकत्व; वस्त्ररहित होना यह दिगम्बर जैन साधुओं के 28 मूलगुणों में से एक मूलगुण हैं “
[[श्रेणी:शब्दकोष]] वस्त्ररहित – Vastrarahita.: Unclothed, Nacked,Natural form of one. अचेलकत्व; वस्त्ररहित होना यह दिगम्बर जैन साधुओं के 28 मूलगुणों में से एक मूलगुण हैं “
[[श्रेणी:शब्दकोष]] पंचनमस्कार मंत्र – Panchanamaskaara Mantra. See – Namokara mantra. देखें – णमोकार मंत्र “
दानवीर्य The main interrogator in the assembly of Lord Suparshvanath. सुपाश्र्वनाथ भगवान के समवसरण के मुख्य श्रोता (प्रश्नकर्ता) का नाम। [[श्रेणी: शब्दकोष ]]
[[श्रेणी:शब्दकोष]] वसुधा – Vasudhaa.: The earth. पृथिवी “वसु अर्थात द्रव्यों को धारण करने वाली पृथिवी वसुधा कहलाती है “
दश भक्ति The collection of different particular devotional prayers. प्राकृतभाषा की सिद्धभक्ति , श्रुतभक्ति, चारित्रभक्ति , योगभक्ति , आचार्यभक्ति , वर्तमान में उपलब्ध ये आठ भक्तियाँ ही आचार्य श्री कुन्दकुन्द स्वामी द्वारा रचित ‘‘दशभक्ति’’ नाम से प्रसिद्ध हैं । संस्कृत की चैत्यभक्ति एंव समाधिभक्ति ये 11 भक्तियाँ ‘‘दशभक्ति’’ नाम से प्रसिद्ध हैं। वर्तमान में पूज्य…
[[श्रेणी:शब्दकोष]] वल्लाभिका – Vallabhikaa.: Beloved female divinities of Indras causing love. इन्द्रों को प्रीति उत्पन्न करने वाली ,अपनी विक्रिया ,प्रभाव ,रूप , स्पर्श से उन्हें रमाने वाली देवियां “
उपायविचय Doing meritorious works . धर्मध्यान का एक भेद-कुमार्ग में पडे़ हुए जीवों के बारे में विचार करना कि ये मिथ्यात्व से कैसे छूटे। अपरनाम अपायविचय।[[श्रेणी:शब्दकोष]]
दर्शनाराधना A type of devotional prayer of right faith. 4 आराधना में एक भेद, निर्दोष सम्यग्दर्शन की आराधना करना, इससे जीवादि सात तत्वों और उनके प्रतिपादक गुरू शास्त्रों पर श्रद्धान होते हैं ।[[श्रेणी: शब्दकोष ]]
[[श्रेणी:शब्दकोष]] वर्द्धमान यन्त्र – Varddhmaana Yantra.: A matallic plate engraved with some auspicious mystic words (Mantras). विभिन्न रेखाकृतियों में विशिष्ट अक्षर – मन्त्रों द्वारा चित्रित किया गया एक यंत्र “
[[श्रेणी :शब्दकोष]] मूलाचार–Mulaachar. Name of a treatise written by Acharya Kund Kund containing the code of conduct of Digambar Jain saints. आचार्य श्रीकुंद–कुंद (अपरनाम) द्वारा प्राकृत गथाओ में निबिद्ध दिगंबर जैन साधु–साध्वियो की आचार–संहिता का वर्णन करने वाला ग्रंथ”श्री वसुनंदी आचार्य (ई.श. 11–12) द्वारा इसकी संस्कृत टीका लिखी गयी है” गनिनिप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी ने…