षड् रस!
[[श्रेणी:शब्दकोष]] षड् रस – Sadrasa. Six particular kinds of delicacies (milk, curd, ghee, oil, salt, sugar). 6 रस- दूध, दही, घी, तेल, नमक, मीठा “
[[श्रेणी:शब्दकोष]] षड् रस – Sadrasa. Six particular kinds of delicacies (milk, curd, ghee, oil, salt, sugar). 6 रस- दूध, दही, घी, तेल, नमक, मीठा “
[[श्रेणी:शब्दकोष]] प्रासुक परित्याग- दया बुद्धि से साधुओं के द्वारा किये जाने वाले ज्ञान, दर्षन, चारित्र के दान का नाम प्रासुक परित्याग है। Prasuka parityaga- Preaching of right faith, right knowledge & right conduct by jaina saints
[[श्रेणी:शब्दकोष]] पद्मनंदि: Name of the disciple of Acharya Shri Kunthusagar Maharaj and many other Digamber Jain Acharyas. आचार्यश्री कुंथुसागर जी महाराज के एक प्रसिद्ध षिष्य ( ई0 श0 20-21) । इस नाम से दिगम्बर जैन आम्नाय में अनेको आचर्य हुए है। आचार्य कुंदकुद स्वामी को भी पदमनंदि नाम से जाना जाता है।
[[श्रेणी:शब्दकोष]] षट्खंडागम टीका – Satkhandaagama Teekaa. The commentary books written on Shatkhandagam- 6 great scriptural parts. षट्खंडागम ग्रंथ के जीवट्ठान,खुद्दाबंध, बंधस्वामित्व विचय, वेदना, वर्गणा, महाबंध, in 6 खण्डों पर उपलब्ध अनेक टीकाएं ” छठे खण्ड पर वीरसेन स्वामी ने संक्षिप्त व्याख्या के अतिरिक्त और कोई टीका नही की है ” सर्वप्रथम परिकर्म नामक टीका आचार्य…
[[ श्रेणी:जैन_सूक्ति_भण्डार ]] [[ श्रेणी:शब्दकोष ]] == तीर्थ : == रत्नत्रयसंयुक्त: जीव: अपि, भवति उत्तमं तीर्थम्। संसारं तरति यत:, रत्नत्रयदिव्यनावा।। —समणसुत्त : ५१४ (वास्तव में) रत्नत्रय से सम्पन्न जीव ही उत्तम तीर्थ (तट) है, क्योंकि वह रत्नत्रयरूपी दिव्य नौका द्वारा संसार—सागर को पार करता है।
[[श्रेणी:शब्दकोष]] श्वेताम्बराभास – Shvetaambaraabhaasa. A sub-sect of Shvetambar Jain group. स्वेताम्बर संघ से उत्पन्न हुआ एक मत, अपरनाम ढूंढिया मत या स्थानकवासी मत “
[[श्रेणी:शब्दकोष]] बंधद्रव्य-कर्म परमाणुओं की संख्या जो बंधरुप हो। BandhaDravya- Aggregates of karmic molecules
[[श्रेणी : शब्दकोष]] वृक्षमूल –Vrksamula. Root of trees, A type of meditation to be observed under the tree. वृक्ष की जड़, एक प्रकार का योग, वर्षाकाल में वृक्ष के नीचे ध्यान लगाना, वृक्षमूल योग कहलाता हैं