शाकटायन न्यास!
[[श्रेणी:शब्दकोष]] शाकटायन न्यास – Shaktaayana Nyaasa. Name of a judicial composition written by Acharya Prabhachandra. आचार्य प्रभाचन्द्र (ई. 950-10120) द्वारा संस्कृत भाषा में रचित न्याय विषयक ग्रंथ “
[[श्रेणी:शब्दकोष]] शाकटायन न्यास – Shaktaayana Nyaasa. Name of a judicial composition written by Acharya Prabhachandra. आचार्य प्रभाचन्द्र (ई. 950-10120) द्वारा संस्कृत भाषा में रचित न्याय विषयक ग्रंथ “
[[श्रेणी:शब्दकोष]] निश्चय तप – Nishchaya Tapa. Absolute austerity (completely engrossed into oneself). मुनि अवस्था में निज स्वरुप में परिणमन होना अर्थात् समस्त परद्रव्य की इच्छा को रोकना निश्चय तपश्चरण है “
[[श्रेणी:शब्दकोष]] सत्य महाव्रत – Satya Mahaavrata. Great vow of true speech (right speaking according to text). राग द्वेष या मोह से प्रेरित जैन साधुओं द्वारा सब प्रकार के झूठ वचनों का त्याग करना और आगम के अनुरूप बोलना सत्य महाव्रत है “
चक्रवाल व्रत Name of a vow to be observed with particular procedure at different Nakshatra days related to their respective lunar months. For eg. observing vow at the day of Chitra Nakshatra in the month of Chaitra. प्रत्येक मास से सम्बंधित नक्षत्र में अयह व्रत ३ वर्ष ३ माह तक किया जाता है जैसे -चैत्रमास…
[[श्रेणी:शब्दकोष]] लौकिक –Laukika : Worldly behaviour ,knowledge etc. व्यवहारिक (व्यवहार में प्रयुक्त होने वाला ज्ञान क्रिया आदि).
[[श्रेणी:शब्दकोष]] निश्चयक्षमा – Nishchayaksamaa. Absolute liberal conduct, free from agitation on other’s misconduct. साधुओं आदि को दुष्टजनद्वारा गाली-गलौच, उपहास, तिरस्कार आदि करने पर भी उनके मन में कलुषता का उत्पन्न होना व्यवहार क्षमा है तथा क्रोध के अभाव में आत्मा में तन्मयता का होना निश्चय क्षमा है “
उपादान कारण(शाश्वत) Affluent cause (eternal). सत्य व अमर उपादान कारण।[[श्रेणी:शब्दकोष]]
[[श्रेणी : शब्दकोष]] ब्रहत्कथासरितसागर – Brhatkathasaritasagara. A book written by Acharya Somdeva . आचार्य सोमदेव (ई. श. १९ मध्य ) द्वारा रचित एक कथाकोष “
[[श्रेणी:शब्दकोष]] शांत कषाय – Shanta Kashaaya. Subsided passion. उपशांत कषाय “
[[ श्रेणी:जैन_सूक्ति_भण्डार ]] [[ श्रेणी:शब्दकोष ]] == विषय : == खेलम्मि पडिअमप्पं जह न तरइ मच्छिआवि मोएऊं। तह विसयखेलपडिअं न तरइ, अप्पंपि कामंधो।। —इन्द्रियपराजय शतक : ४६ जिस तरह श्लेष्म में पड़ी हुई मक्खी श्लेष्म से बाहर निकलने में असमर्थ होती है, वैसे ही विषयरूपी श्लेष्म में पड़ा हुआ व्यक्ति अपने आपको विषय से अलग…