धर्मचक्र विधान परमपूज्य चारित्रश्रमणी आर्यिका श्री अभयमती माताजी द्वारा रचित कतिपय विधानों की शृँखला में ‘‘धर्मचक्र विधान’’ एक सुन्दर कृति है। तीर्थंकर भगवान के केवलज्ञान उत्पन्न होने के पश्चात् कुबेर द्वारा समवसरण की रचना होती है, उस समवसरण में चारों दिशाओं में सर्वाण्हयक्ष अपने मस्तक पर धर्मचक्र को धारण करते हैं तथा तीर्थंकर के श्रीविहार…
संज्ञा प्ररूपणासार संज्ञा—जिनके द्वारा संक्लेश को प्राप्त होकर जीव इस लोक में दु:ख को प्राप्त करते हैं और जिनका सेवन करके दोनों ही भवों में दारुण दु:खों को प्राप्त होते हैं उनको ‘‘संज्ञा’’ कहते हैं। संज्ञा नाम वाञ्छा का है। जिसके निमित्त से दोनों ही भवों में दारुण दु:ख की प्राप्ति होती है उस वाञ्छा…
सगर चक्रवर्ती द्वितीय तीर्थंकर अजितनाथ के तीर्थ में सगर चक्रवर्ती हुए हैं, इनके पूर्वभवों को सुनाते हैं-जम्बूद्वीप के पूर्वविदेह में सीता नदी के दक्षिण तट पर वत्सकावती देश है-विदेह क्षेत्र है। वहाँ के राजा जयसेन की जयसेना रानी के रतिषेण और धृतिषेण दो पुत्र थे। किसी समय रतिषेण पुत्र की मृत्यु से राजा जयसेन बहुत…
प्रवचन पद्धति प्रवचनकर्ता विद्वान् को पहले निम्नलिखित चार बातों को समझ लेना अति आवश्यक है-प्रवचनकर्ता, प्रवचन का विषय, प्रवचन और प्रवचन का फल। अर्थात् प्रवचनकर्ता वैâसा होना चाहिए? उसमें क्या-क्या गुण आवश्यक हैं? प्रवचन का विषय क्या है? प्रवचन किसे कहते हैं? और प्रवचन का फल क्या है? इन चारों को समझकर प्रवचन करने वाला…
भाव बंध और द्रव्य बंध जिन चेतन के परिणामों से, ये कर्म जीव से बंधते हैं। उन भावों को ही भावबंध, संज्ञा श्रीजिनवर कहते हैं।। जो कर्म और आतम प्रदेश, इनका आपस में मिल करके। अति एकमेक हो बंध जाना, यह द्रव्यबंध है बहुविध से।।३२।। आत्मा के जिन भावों से कर्म बंधता है, वह आत्मा…
धाराशिव नगर में १००८ खम्भों का जिनमंदिर आराधना कथाकोष संस्कृत में करकण्डु राजा की कथा में १००८ खम्भों वाले जिनमंदिर का वर्णन आया है— मार्गे तेरपुराभ्यर्णे संस्थितः सैन्यसंयुतः। तदागत्य च भिल्लाभ्यां तं प्रणम्य प्रजल्पितम्।।१४३।। अस्मात्तेरपुरादस्ति दक्षिणस्यां दिशि प्रभो। गव्यूतिकान्तरे चारु पर्वतस्योपरिस्थितम्।।१४४।। धाराशिवपुरं चास्ति सहस्रस्तंभसंभवम्। श्रीमज्जिनेन्द्रदेवस्य भवनं सुमनोहरम्।।१४५।। तस्योपरि तथा शैल-मस्तके संप्रवत्र्तते। वल्मीकं तच्च सद्धस्ती शुभो…
उमास्वामी श्रावकाचार तत्त्वार्थसूत्र के कर्ता के द्वारा ही रचित है। एवं व्रतं मया प्रोक्तं त्रयोदशधैर्युतम्। निरतिचारकंपाल्यं तेऽतीचारास्तु सप्ततिः।।४६३।। अर्थ –इस प्रकार मैंने श्रावकों के तेरह प्रकार के चारित्र का निरूपण किया है। ये तेरहों प्रकार के व्रत अतिचार रहित पालन करने चाहिये। इन सब व्रतोंं के अतिचारों की संख्या सत्तर है। प्रत्येक व्रत के पाँच-पांच…
पूजा के प्रकार (भेद) आदिपुराण में पूजा ४ प्रकार की बताई है— कुलधर्मोऽयमित्येषामर्हत्पूजादिवर्णनम्। तदा भरतराजर्षिरन्ववोचदनुक्रमात्आदिपुराण भाग-२ पर्व-३८ पृ. २४२, श्लोक २५ से ३५ तक।।।२५।। प्रोक्ता पूजार्हतामिज्या सा चतुर्धा सदार्चनम्। चतुर्मुखमहः कल्पद्रुमाश्राष्टाह्निकोऽपि च।।२६।। तत्र नित्यमहो नाम शश्वज्जिनगृहं प्रति। स्वगृहान्नीयमानाऽर्चा गन्धपुष्पाक्षतादिका।।२७।। चैत्यचैत्यालयादीनां भक्त्या निर्मापणं च यत्। शासनीकृत्य दानं च ग्रामादीनां सदार्चनम्।।२८।। या च पूजा मुनीन्द्राणां नित्यदानानुषङ्गिणी। स…
गुणस्थान चर्चा (गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी से एक सैद्धातक वार्ता) चन्दनामती – पूज्य माताजी! आज मैं आपसे जानना चाहती हूँ कि गुणस्थान किसे कहते हैं? श्री ज्ञानमती माताजी – इसके विषय में मैं तुम्हें बताती हूँ-दर्शनमोहनीय आदि कर्मों की उदय, उपशम आदि अवस्था के होने पर जीव के जो परिणाम होते हैं, उन परिणामों को…