02.2 कर्म के भेद-प्रभेद एवं प्रत्येक कर्मबंध के कारण
कर्म के भेद-प्रभेद एवं प्रत्येक कर्मबंध के कारण कर्म के मूल भेद जैन कर्म-शास्त्र की दृष्टि से कर्म की आठ मूल प्रकृतियाँ हैं, जो प्राणियों के अनुकूल और प्रतिकूल फल प्रदान करती हैं। वे हैं-१. ज्ञानावरण, २. दर्शनावरण, ३. वेदनीय, ४. मोहनीय, ५. आयु, ६. नाम, ७. गोत्र, ८. अंतराय। इनमें से ज्ञानावरण, दर्शनावरण, मोहनीय…