02. जिनसहस्रनाम स्तोत्र (द्वितीय अध्याय)
1 2 3 4 जिनसहस्रनाम स्तोत्र (द्वितीय अध्याय) चाल-हे दीनबंधु.......... हे नाथ ‘दिव्यभाषापति’, आप कहाये। अठरा महाभाषा व लघू, सात सौ गाये।। तुम नाम मंत्र भक्ती, भव व्याधि हरेगी। ये ज्ञानज्योति देके, अज्ञान हरेगी।।१०१।। हे नाथ ‘दिव्य’ तुम हो, अतिशय सुरूप से। नर सुर से अधिक सुंदर, तन आपका दिपे।।तुम.।।१०२।। हे ‘पूतवाक्’ आपकी, वाणी पवित्र...