नागोजी भट्ट!
[[श्रेणी:शब्दकोष]] नागोजी भट्ट – Nagoji Bhatta Name of the Commentator, the promoter of Yoga philosophy. योगदर्शन के साहित्यक प्रवर्तक (ई.श.17), इन्होंने छाया व्याख्या नमक टिकाएँ लिखी ”
[[श्रेणी:शब्दकोष]] नागोजी भट्ट – Nagoji Bhatta Name of the Commentator, the promoter of Yoga philosophy. योगदर्शन के साहित्यक प्रवर्तक (ई.श.17), इन्होंने छाया व्याख्या नमक टिकाएँ लिखी ”
[[श्रेणी : शब्दकोष]] भिण्डिमाला – Bhindimala. Name of a weapon of the era of Ram. राम के समय का एक शस्त्र “
[[श्रेणी:शब्दकोष]] प्रत्यक्षज्ञान- pratyaksajnana Direction knowledge gained by the soul itself without any external help. इनिद्रय और मन की सहायता के बिना जो ज्ञान पदार्थ को स्पश्ट जाने, इसके दो भेदहैं- देष प्रत्यक्ष (अवधि एवं मन:पर्ययज्ञान) एवं सकल प्रत्यक्ष (केवलज्ञान)
[[श्रेणी : शब्दकोष]] विश्वनंदि – Vishvnamdi. Name of a Bhattarak of Nadi group, Past-birth name of the 2nd Narayan, Triprishtha who be-came Lord Mahavira after some next births. नंदिसंघ बलात्कारगण उज्जयिनी गद्दी के एक भट्टारक ” अपरनाम विष्णुनंदि ” समय – वि.सं. – ७०४ ” नारायण त्रिपृष्ट के दूसरे पूर्व भव का नाम ” यही…
[[ श्रेणी:जैन_सूक्ति_भण्डार ]] [[ श्रेणी:शब्दकोष ]] == संबंध : == पंथे पहियजणाणं जह संजोओ हवेइ खणमित्तं। बंधुजणाणं च तहा संजोओ अद्धुओ होई।। —कार्तिकेयानुप्रेक्षा : ८ जैसे मार्ग में पथिकजनों का संयोग क्षणमात्र होता है, वैसे ही बंधुजनों का संयोग अस्थिर है।
[[श्रेणी:शब्दकोष]] प्रतिहरण- pratiharna Providing remedy for the fault. मिथ्यात्व रागादि दोशों का निवारण करना।
[[श्रेणी :शब्दकोष]] मौन–Maun. To keep silent or mum, externally or internally. मूकभाव अर्थात् बाहा की वचन प्रवृत्ति को भी पूर्ण रूप से छोड़ देना”
[[श्रेणी : शब्दकोष]] भाषा – Bhasha. Language,speech. साधारण बोलचाल को भाषा कहते हैं ” यह अक्षरी, अनक्षरी के भेद से दो प्रकार की होती है “
[[श्रेणी: शब्दकोष]]स्वसंवेदन ज्ञान – Svasammvedana Jnnaaana. The right knowledge about self, another name of Nishchay Mokshmarg (path of salvation). आत्मज्ञान, निश्चय मोक्षमार्ग का अपरनाम।
[[ श्रेणी:जैन_सूक्ति_भण्डार ]] [[ श्रेणी:शब्दकोष ]] == वेषभूषा : == वेषोऽपि अप्रमाण:, असंयमपदेषु वर्तमानस्य। किं परिर्विततवेषं, विषं न मारयति खादन्तम्।। —समणसुत्त : ३५६ (संयम मार्ग में) वेश प्रमाण नहीं है, क्योंकि वह असंयमीजनों में भी पाया जाता है। क्या वेश बदलने वाले व्यक्ति को खाया हुआ विष नहीं मारता ?