षड्विशंति!
[[श्रेणी:शब्दकोष]] षड्विशंति – Sadvishanti. Twenty six (26 delusive Karmic nature of false believers etc.). 26, नियम से मिथ्यादृष्टि जीव मोह की 26 प्रकृतियों का स्वामी होता है “
[[श्रेणी:शब्दकोष]] षड्विशंति – Sadvishanti. Twenty six (26 delusive Karmic nature of false believers etc.). 26, नियम से मिथ्यादृष्टि जीव मोह की 26 प्रकृतियों का स्वामी होता है “
[[श्रेणी:शब्दकोष]] प्रियंगु- सुदिनाथ एवं पग्प्रभ भगवान के दीक्षा वृक्ष का नाम। Priyamgu-Name of the initiation tree of lord sumantinath & lord padamaprabha.
[[श्रेणी: शब्दकोष]] परंपरा मुक्ति Salvation after one or two births.एक दो आदि भवों के अनंतर मुक्ति होना ।
[[श्रेणी : शब्दकोष]] विभ्य – Vibhya. An infraction of paying reverence (reverence due to influence of Acharya etc.). वंदना का एक अतिचार, आचार्य आदि के भय से वंदना करना “
[[श्रेणी:शब्दकोष]] संभिन्नश्रोत ऋद्धि – Sanbhinnashrotra Riddhi. A super power of replying at once the queries of all beings present in all 10 directions. बुद्धि ऋद्धि के 18 भेदों में एक भेद; जिस ऋद्धि के प्रभाव से साधु श्रोत्र-इन्द्रिय के उत्कृष्ट क्षेत्र से बाहर दशों दिशाओं में संख्यात योजन प्रमाण क्षेत्र में स्थित मनुष्य और तिर्यंचों…
आलापन बंध Bondage related to basic material and articles constituted by the same. शकटों का यानों का,रथों तोरणों का कष्ठ से लोहे, चमड़े की रस्सी इत्यादि से तथा इनसे लेकर अन्य द्रव्यों से आलापित अन्य द्रव्यों का जो बंध होता है।[[श्रेणी:शब्दकोष]]
[[ श्रेणी:जैन_सूक्ति_भण्डार ]] [[ श्रेणी:शब्दकोष ]] == मोक्ष—मार्ग : == दर्शनज्ञानचारित्राणि, मोक्षमार्ग इति सेवितव्यानि। साधुभिरिदं भणितं, तैस्तु बन्धो वा मोक्षो वा।। —समणसुत्त : १९३ जिनेन्द्र देव ने कहा है कि (सम्यक्) दर्शन, ज्ञान, चारित्र मोक्ष का मार्ग है। साधुओं को इनका आचरण करना चाहिए। यदि वे स्वाश्रित होते हैं तो इनसे मोक्ष होता है और…
[[श्रेणी:शब्दकोष]] षट् अनायतन – Sat Anaayatana. Six reasons of false belief. मिथ्यात्वादि के कारणाभूत 6 स्थान; कुदेव, कुगुरू, कुशास्त्र व इन तीनों के भक्त “
[[ श्रेणी:जैन_सूक्ति_भण्डार ]] [[ श्रेणी:शब्दकोष ]] == नश्वरता : == जम्मं मरणेण समं, संपज्जइ जुव्वणं जरासहियं। लच्छी विणससहिया, इय सव्वं भंगुरं मुणह।। —कार्तिकेयानुप्रेक्षा : ५ जन्म के साथ मरण, यौवन के साथ बुढ़ापा, लक्ष्मी के साथ विनाश निरंतर लगा हुआ है। इस प्रकार प्रत्येक वस्तु को नश्वर समझना चाहिए