त्रिगुप्ति!
त्रिगुप्ति A vow (fasting) of 30 days with particular method. मन,वचन, काय की प्रवृत्ति को रोककर वश में रखना, यह संवर का एक कारण है। अनंतनाथ भगवान के पूर्व भव के पिता का नाम । [[श्रेणी: शब्दकोष ]]
त्रिगुप्ति A vow (fasting) of 30 days with particular method. मन,वचन, काय की प्रवृत्ति को रोककर वश में रखना, यह संवर का एक कारण है। अनंतनाथ भगवान के पूर्व भव के पिता का नाम । [[श्रेणी: शब्दकोष ]]
तीर्थस्नान To take bath in a holy river or place, Ceremonial bath. वैदिक परम्परानुसार गंगा आदि तीर्थे में स्नान करना, मिथ्यात्वादि दोषों से मलिन प्राणी ऐसे तीर्थस्नान से विशुद्ध नहीं हो पाता । जैनशासन के अनुसार अरिहंत परमेष्ठी द्वारा प्रतिपादित ज्ञानयपी गंगा में अवगाहन करना ही वासतविक तीर्थस्थान है। [[श्रेणी: शब्दकोष ]]
[[श्रेणी: शब्दकोष]]हंसद्वीप – Hammsadviipa. Name of an island. एक द्वीप। यह लंका द्वीप के समीप था। राक्षवंशी अमररक्ष द्वारा बसाये गये 10 द्वीपो मे 5 वां द्वीप।
[[श्रेणी: शब्दकोष]] परद्रव्य ग्राहक नय: A type of standpoint related to the non existent nature of matters in view of Parchatushtaya.ऐसा नय जिसकी अपेक्षा से परचतुष्टय की अपेक्षा द्रव्य का नास्तित्व स्वभाव है।
[[श्रेणी: शब्दकोष]]स्वार्थ प्रमाण – Svaartha Pramaana. Authority (Praman) of self knowledge. प्रमाण के दो भेदो मे एक भेद, ज्ञानात्मक प्रमाण को स्वार्थ प्रमाण कहते हैै। श्रुतज्ञान को छोड़कर शेष 4 ंस्वार्थ प्रमाण है परन्तु श्रुतज्ञान स्वार्थ और परार्थ दोनो प्रकार का हैं। वचनात्मक प्रमाण परार्थ प्रमाण कहलाता है।
तीर्थक्षेत्र Place of pilgrimages, related to 5 auspicious events of the life of Jaina Lord etc. गर्भादि पंचकल्याणक क्षेत्र व अन्य केवली के सिद्ध स्थान व अतिशय क्षेत्र। [[श्रेणी: शब्दकोष ]]
[[श्रेणी:शब्दकोष]] सांव्यवहारिक प्रत्यक्ष – Saamvyavahaarika Pratyaksha. Right sensual apprehension or perception. प्रत्यक्ष के दो भेदो मे एक भेद जो ज्ञान इन्द्रिय और मन की सहायता से पदार्थ को एकदेष स्पष्ट जानता है। उसे सांव्यवहारिक प्रत्यक्ष कहते है। यद्यपि सैद्वान्तिक दृष्टिकोण से यह परिभाषा परोक्ष ज्ञान मे धटित होती है परन्तु न्याय की भाषा मे इसे…
देशात्मवाद Doctrine of believing extrinsic pleasures. बहिरात्मपना जो शुद्धदात्मा अनुभूति से विमुख इन्द्रिय सुख में आसक्ति एवं देह को आत्मा मानता है।।[[श्रेणी: शब्दकोष ]]