चतुर्दश परिग्रह!
चतुर्दश परिग्रह Fourteen types of internal attachments. १४ प्रकार के अन्तरंग परिग्रह- मिथ्यात्व , हास्यादि नव नोकषाय एवं क्रोधादि चार कषाय ।[[श्रेणी:शब्दकोष]]
चतुर्दश परिग्रह Fourteen types of internal attachments. १४ प्रकार के अन्तरंग परिग्रह- मिथ्यात्व , हास्यादि नव नोकषाय एवं क्रोधादि चार कषाय ।[[श्रेणी:शब्दकोष]]
[[श्रेणी : शब्दकोष]] भाव लोकोत्तर मान – Bhava Lokottara Mana. Extent of knowledge (Nigod to Supreme state). जघन्य से उत्क्रष्ट अवस्था तक का ज्ञान जिससे मापा जाय अर्थात् लब्ध्य-पर्याप्तक सूक्ष्म निगोदिया जीव के जघन्य पर्याय श्रुतज्ञान से लेकर अर्हतों के उत्क्रष्ट केवलज्ञान तक का प्रमाण “
[[श्रेणी: शब्दकोष]]स्वर्णमध्य – Svarnamadhya. Another name of Sumeru mountain. सुमेरु पर्वत का अपरनाम।
त्रिवर्गगतवाद A doctrine of solitariness. एक एकांत मत। [[श्रेणी: शब्दकोष ]]
[[श्रेणी:शब्दकोष]] सन्यास मरण – Sanyaasa Marana. The holy death of an ascetic. मुनि व्रत धारण कर पंडित मरण करना
[[श्रेणी: शब्दकोष]]स्वरुप विपर्यास – Svaruupa Viparyaasa. A contary viewpoint regarding the form of a matter. मिथ्यात्व। जिस पदार्थ का जो लक्षण है उससे विपरीत उसका स्वरुप समझना।
[[श्रेणी:शब्दकोष]] राजगृह – तीर्थकर मुनिसुव्रतनाथ के चार कल्याणक गर्भ, जन्म, दीक्षा, और केवनज्ञान प्राप्ति की भूमि एवं भगवान महावीर स्वामी की प्रथम दिव्य देषना भूमि, ये मगध देष की राजधानी थी तथा यहा राजा श्रणिक राज करते थे।यहा से जीवधर कुमार, सुधर्माचार्य आदि अनेक साधु मोक्ष गये हैं।यहां विपुलाचल आदि पाच पर्वत है इसलिए इसे…
[[श्रेणी:शब्दकोष]] संतोष भावना – Santosha Bhaavanaa. Attitude of equanimity or satisfaction. मान अपमान में समता रखना, अशन पान आदि के यथायोग्य लाभ में समता रखना संतोष भावना है “
[[श्रेणी:शब्दकोष]] संयोगगति – Sanyogagati. Motion with support (like motion of chariot by elephant etc). मेघ, रथ, मूसल, आदि की क्रमशः वायु, हाथी तथा हाथ के संयोग से होने वाली गति “
[[ श्रेणी:जैन_सूक्ति_भण्डार ]] [[ श्रेणी:शब्दकोष ]] == क्षमा : == यदि किन्चित् प्रमादेन, न सुष्ठु यस्माभि: सह र्विततं मया पूर्वम्। तद् युष्मान् क्षमयाम्यहं, नि:शल्यो निष्कषायश्च।। —समणसुत्त : ८७ अल्पतम प्रमादवश भी यदि मैंने आपके प्रति उचित व्यवहार नहीं किया हो तो मैं नि:शल्य और कषायरहित होकर आपसे क्षमा—याचना करता हूँ। कोहेण जो ण तप्पदि, सुर–णरतिरिएहि…