दर्पणतुल्य भूमि!
दर्पणतुल्य भूमि An excellence of Lord Arihant (Land to have like mirror).अरहंतो के केवलज्ञान का एक, अतिशय, दर्पण के समान भूमि का स्वच्छ होना। [[श्रेणी: शब्दकोष ]]
दर्पणतुल्य भूमि An excellence of Lord Arihant (Land to have like mirror).अरहंतो के केवलज्ञान का एक, अतिशय, दर्पण के समान भूमि का स्वच्छ होना। [[श्रेणी: शब्दकोष ]]
[[श्रेणी:जैन_सूक्ति_भण्डार ]] [[श्रेणी:शब्दकोष ]] == कुल : == पुरिसाण कुलीणाण वि न कुलं विणयस्स कारणं होइ। चंदाऽमय—लच्छि सहोयरं पि मारेइ किं न विसं।। —गाहारयणकोष : १०० कुलीन पुरुषों का कुल विनय (आचार) का कारण (प्रमाण) नहीं होता। विष चन्द्र, अमृत एवं लक्ष्मी का सहोदर होते हुए भी क्या प्राण नाश नहीं करता ?
गंधदेव A protector deity of Nandishvar dvip (island) and kshaudravar. नन्दीश्वर द्वीप तथा क्षौद्रवर का रक्षक देव । [[श्रेणी:शब्दकोष]]
[[श्रेणी:शब्दकोष]] नंदिषेणा – Namdisena Name of the female deity of Ruchak mountain. रुचक पर्वत की दिक्कुमारी देवी ”
[[श्रेणी:शब्दकोष]] शांतिसागर परम्परा – Shantisaagar Paramparaa. The tradition of first Digambar Jain Acharya Charitra Chakravarti Shri Shantisaagarji Maharaj of 20th century, the renovator of Jaina asceticism of new age. बीसवीं सदी के प्रथम दिगम्बर जैनाचार्य चरित्र चक्रवर्ती श्री शांतिसागर जी महाराज ने चूँकि इस युग में मुनिपरम्परा को पुनः जीवंत कर चतुर्विध संघ परम्परा को…
[[श्रेणी:शब्दकोष]] नंदसप्तमी व्रत – Namdasaptami Vrata A particular vow is to be followed for seven years. सात वर्ष तक प्रतिवर्ष भादों सुदी 7 को उपवास करना ”
[[श्रेणी:शब्दकोष]] निश्चय आलोचना – Nishchaya – Aalochanaa. Absolute introspection. जीव द्वारा परिणामों को समभाव में स्थापित कर निज आत्मा में तन्मय होना निश्चय आलोचना है”यह मुनि अवस्था में घटित होती है “
[[श्रेणी : शब्दकोष]] वीर निर्वाण संवत –Vira Nirvana Samvat. Era beginning with the salvationof Lord Mahavira. वीर निर्वाण से प्रारम्भ होने वाला संवत ” जो वर्तमान में सबसे प्रचीन संवत के रूप में मान्य हैं ” वर्तमान ई सन २००३ – २००४ में वी. नि. सं. २५३० चल रहा हैं ” तिलोयपण्णत्ति (अधिकार ४, गाथा…
[[श्रेणी : शब्दकोष]] वेतरणी –Vetarani. Name of a river of hell. नरक लोक की नदी ” जो खून , पीप से भरी हुई है और उसमे प्रवेश करने वाले को दाह उत्पन्न कराती है “