स्वयंप्रभ!
[[श्रेणी: शब्दकोष]]स्वयंप्रभ – Svayammprabha. Name of the 4th predestined Tirthankar (Jaina Lord), name of a summit of Ruchak mountain. भावीकालीन चैथे तीर्थकर, रुचक पर्वतस्थ एक कूट।
[[श्रेणी: शब्दकोष]]स्वयंप्रभ – Svayammprabha. Name of the 4th predestined Tirthankar (Jaina Lord), name of a summit of Ruchak mountain. भावीकालीन चैथे तीर्थकर, रुचक पर्वतस्थ एक कूट।
[[ श्रेणी:जैन_सूक्ति_भण्डार ]] [[ श्रेणी:शब्दकोष ]] == स्नेह : == नियलेहि पुरिओ च्चिय वच्चइ पुरितो जहिच्छियं देसं। एक्कं पि अंगुलमिणं, न जाइ घणनेह—पडिबद्धो।। —पउमचरिउ : ५६९ जंजीरों से बंधा हुआ मनुष्य इच्छानुसार देश में जा सकता है, पर घने स्नेह से जकड़ा हुआ मनुष्य एक अंगुल भी नहीं जा सकता।
[[श्रेणी : शब्दकोष]] विस्तार सम्यग्दर्शन –VistaraSamyagdarsana. Right faith after thorough learning of scriptures. सम्यकत्व के १० भेदों में सातवा भेद, जीव आदि तत्त्वों को विस्तार रूप, से सुनकर जो श्रध्दान हो वह विस्तार सम्यग्दर्शन है “
[[श्रेणी: शब्दकोष]]स्वभाव द्रव्य व्यंजन पर्याय – Svabhaava Dravya Vyamjana Paryaaya. Natural state of soul points in the salvated form. बिना दूसरे के निमित से जो व्यंजन पर्याय होती है वह स्वभाव द्रव्य व्यंजन पर्याय है। जीव का सिद्वपने का आकार या जीव की सिद्वपर्याय।
[[श्रेणी:शब्दकोष]] स्वभाव अनित्य नय – Svabhaava Anitya Naya. A standpoint related to non-eternity in pure nature.सत्तगौण उत्पादध्ययग्राहक स्वभाव अनित्य शुद्व पर्या
[[श्रेणी:शब्दकोष]] स्वपर चतुष्टय – Svapara Catustaya. Quartel of the properties of matter (in relation to Dravya, Kshetra, Kal, Bhav) related to self & others.द्रव्य का अपना द्रव्य-क्षेत्र-काल-भाव स्वचतुष्टय एवं इतर द्रव्य-क्षेत्र-काल-भाव परचतुष्टय कहलाता है। इसकी अपेक्षा ही वस्तु मे अस्तिनास्ति, भेदाभेदपना पाया जाता है।
[[ श्रेणी:जैन_सूक्ति_भण्डार ]] [[श्रेणी:शब्दकोष ]] == दया : == दयामूलो भवेद्धर्मो दया प्राण्यनुकम्पनम्। दयाया: परिरक्षार्थं गुणा: शेषा: प्रर्कीितता:।। —आदिपुराण : ५-२७ धर्म का मूल दया है। प्राणी पर अनुकम्पा करना दया है। दया की रक्षा के लिए ही सत्य, क्षमा शेष गुण बताए गए हैं। मा हससु परं दुहियं कुणसु दयं णिच्चमेव दीणम्मि। —कुवलयमाला :…
[[श्रेणी : शब्दकोष]] भदेय – Bhadeya. Name of a mountain of Bharat Kshetra Arya Khand (region). भरतक्षेत्र आर्य खण्ड का एक पर्वत “
[[श्रेणी:शब्दकोष]] स्वतत्त्व – Svatattva. Real nature of the soul.जीव के निज भाव-औपशमिक, क्षायिक, क्षायोपशमिक, औदयिक और पारिणमिक भाव।