चतुर्थगुणस्थान में आत्मानुभूति परमपूज्य गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी से डॉ. श्रेयांस कुमार जैन, बड़ौत (अध्यक्ष-अ.भा. दिगम्बर जैन शास्त्रिपरिषद) का एक विशेष साक्षात्कार डॉ. श्रेयांस – पूज्य माताजी! वंदामि, आज हम लोग आपसे ‘चतुर्थ गुणस्थान की पात्रता’ के विषय में विद्वानों के बीच चलने वाली ऊहापोह के विषय में समाधान प्राप्त करने हेतु उपस्थित हुए…
धर्मचक्र विधान परमपूज्य चारित्रश्रमणी आर्यिका श्री अभयमती माताजी द्वारा रचित कतिपय विधानों की शृँखला में ‘‘धर्मचक्र विधान’’ एक सुन्दर कृति है। तीर्थंकर भगवान के केवलज्ञान उत्पन्न होने के पश्चात् कुबेर द्वारा समवसरण की रचना होती है, उस समवसरण में चारों दिशाओं में सर्वाण्हयक्ष अपने मस्तक पर धर्मचक्र को धारण करते हैं तथा तीर्थंकर के श्रीविहार…
संज्ञा प्ररूपणासार संज्ञा—जिनके द्वारा संक्लेश को प्राप्त होकर जीव इस लोक में दु:ख को प्राप्त करते हैं और जिनका सेवन करके दोनों ही भवों में दारुण दु:खों को प्राप्त होते हैं उनको ‘‘संज्ञा’’ कहते हैं। संज्ञा नाम वाञ्छा का है। जिसके निमित्त से दोनों ही भवों में दारुण दु:ख की प्राप्ति होती है उस वाञ्छा…
पुण्य-पाप पदार्थ शुभ भाव सहित ये जीव नियम से, पुण्यरूप हो जाते हैं।और अशुभ भाव से पापरूप, मिल नव पदार्थ कहलाते हैं।।साता प्रकृति शुभ आयु नाम, शुभगोत्र सुपुण्य प्रकृतियाँ हैं।इनसे उलटी जो अशुभ आयु, नामादिक पाप प्रकृतियाँ हैं।।३८।। शुभ और अशुभ भावों से सहित जीव नियम से पुण्यरूप और पापरूप होते हैं। सातावेदनीय, शुभ आयु,…
गुणस्थानसार प्राण प्ररूपणा सार बाह्य उच्छ्वास आदि बाह्य प्राणों से तथा इंद्रियावरण कर्म के क्षयोपशम आदि अभ्यन्तर प्राणों से जिनमें जीवितपने का व्यवहार होता है वे जीव हैं अर्थात् जिनके सद्भाव में जीव में जीवितपने का और वियोग होने पर मरणपने का व्यवहार हो, उनको प्राण कहते हैं। पर्याप्ति कारण है आौर प्राण कार्य है।…
भीम महामुनि ने भाले के अग्रभाग से दिये जाने रूप वृत्तपरिसंख्यान नियम लिया इत्थं ते पाण्डवाः श्रुत्वा धर्म पूर्वभवांस्तथा। संवेगिनो जिनस्यान्ते संयमं प्रतिपेदिरे।।१४३।। कुन्ती च द्रोैपदी देवी सुभद्राद्याश्च योषितः। राजीमत्याः समीपे ताः समस्तास्तपसि स्थिताः।।१४४।। ज्ञानदर्शनचारित्रैव्र्रतैःसमितिगुप्तिभिः। आत्मानं भावयन्तस्ते पाण्डवाद्यास्तपोऽचरन्।।१४५।। शार्दूलविक्रीडितम् कुन्ताग्रेण वितीर्णभैक्ष्यनियमः क्षुत्क्षामगात्रः क्षमः षण्मासैरथ भीमसेनमुनिपो निष्ठाप्य स्वान्तक्लमम्। षण्माद्यैरुपवासभेदविधिभिर्निष्ठाभिमुख्यैः स्थित- ज्र्येष्ठाद्र्यैिवजहार योगिभिरिलां जैनागमाम्मोधिभिः।।१४६।। (हरिवंशपुराण पृ. ७९६,…
अग्नि में हवन के प्रमाण एवं सप्तमप्रतिमाधारी ब्रह्मचारी भी हवन करें तदाकर्णेनमात्रेण सत्वरः सर्वसंगतः। चक्रवर्ती तमभ्येत्य त्रिःपरीत्य कृतस्तुतिः।।३३६।। महामहमहापूजां भक्त्या निवर्तयन्स्वयम्। चतुर्दश दिनान्येवं भगवन्तमसेवत।।३३७।। माघकृष्णचतुर्दश्यां भगवान् भास्करोदये। मुहूर्तेऽभिजिति प्राप्तपल्यज्रे मुनिभिः समम्।।३३८।। प्राग्दिङ्मुुखस्तृतीयेन शुक्लध्यानेन रूद्ववान्। योगत्रितयमन्येन ध्यानेनघातिकर्मणाम्।।३३९।। पञ्चह्वस्वरोञ्चारणप्रमाणेन संक्षयम्। कालेन विदधत्प्रान्तगुणस्थानमष्टितिः।।३४०।। शरीरत्रितयापाये प्राप्य सिद्धवपर्ययम्। निजाष्टागुणसंंपूर्णः क्षणाप्तनुवातकः।।३४१।। नित्यो निरञ्जनःकिंचिदूनो देहादमूर्तिभाक्। स्थितःस्वसुखसाद्भृतःपश्यन्विश्चमनारतम्।।३४२।। तदागत्य सुराः सर्वे प्रान्तपूजाचिकीर्षया। पवित्रं परमं…
हुंडावसर्पिणी के दोष से होने वाले कार्य चक्किस विजयभंगो णिव्वुइगमणं च थोवजीवाणं। चक्कधराउ दिजाणं हवेदि वंसस्स उप्पत्ती।।१६१८।। दुस्समसुसमे काले अट्ठावण्णा सलायपुरिसा य। णवमादिसोलसंतं सत्तसु तित्थेसु धम्मवोच्छेदो।।१६१९।। एक्करस होंति रुद्दा कलहपिया णारदा य णवसंखा। सत्तमतेवीसंतिमतित्थयराणं च उवसग्गो।।१६२०।। तदियचदुपंचमेसुं कालेसुं परमधम्मणासयरा। विविहकुदेवकुिंलगी दीसंते दुट्ठपाविट्ठा।।१६२१।। चंडालसबरपाणप्पुिंलदणाहलचिलायपहुदिकुला। दुस्समकाले कक्की उवकक्की होंति बादाला।।१६२२।। अइवुट्ठिअणावुट्ठी भूवड्ढी वज्जअग्गिपमुहा य। इय णाणाविहदोसा विचित्तभेदा…
भावनिर्जरा-द्रव्यनिर्जरा जिन परिणामों से यथाकाल, फल देकर पुद्गल कर्म झड़े। और जिन भावों से तप द्वारा, फल दें अकाल में कर्म झड़ें।। बस भावनिर्जरा कहलाता, है भाव वही ऐसा जानो। है द्रव्यनिर्जरा कर्मों का, झड़ना यह बात सही मानो।।३६।। यथासमय-उदय काल में फल देकर अथवा तप के द्वारा आत्मा के जिन भावों से कर्म झड़…