पदस्थ ध्यान
पदस्थ ध्यान धर्मध्यान के अंतर्गत जो चौथा संस्थानविचय भेद है, उसके भी चार भेद माने हैं-पिंडस्थ, पदस्थ, रूपस्थ और रूपातीत। संक्षेप में इनका लक्षण यह है कि- ‘‘पदस्थं मंत्रवाक्यस्थं पिण्डस्थं स्वात्मचिंतनम्। रूपस्थं सर्वचिद्रूपं रूपातीतं निरंजनम्।।’’ अनेक मंत्र वाक्यों का ध्यान करना पदस्थ ध्यान है, अपनी आत्मा का चिंतवन करना पिंडस्थ ध्यान है, जिसमें सर्व…