अथ श्रीचक्रेश्वरीदेवी अष्टोत्तरशतनाम बीजाक्षर मन्त्राः अष्टोत्तरशतं शुभ्रैः पुष्पैर्वामणिभिस्तथा।यक्षेश्वरी-पदाम्भोजे जपं कृत्वा नमाम्यऽहम् ।। १. ॐ आं क्रों ह्रीं चक्रेश्वर्यै नमः …
जैन धर्म के प्रवर्तक आदिब्रह्मा श्री ऋषभदेव भगवान वर्तमान काल के प्रथम तीर्थंकर हुए हैं जिन्होंने शाश्वत जन्मभूमि अयोध्या में जन्म लेकर प्रजा को असि, मसि आदि षट् क्रियाएं बताकर जीने की कला सिखाई।
पूज्य माता जी ने भगवान ऋषभदेव की भक्ति करते हुए संस्कृत में एकाक्षरी छंद से लेकर अष्टाक्षरी छंद तक, छंद के नाम सहित श्री ऋषभदेव स्तोत्र की रचना की है इस पुस्तक में संस्कृत के साथ-साथ हिंदी में भी अनेक स्तुतियां है
यह अद्वितीय स्तुति पढ़कर भव्यजीव अपने जीवन को धन्य करें ,यही मंगल कामना है
जैनधर्म के 23वें तीर्थंकर भगवान पार्श्वनाथ का जीवन एक विशेष इतिहास को लिए हुए हैं ,वर्तमान में संसारी प्राणियों के जीवन में कालसर्प योग दोष को दूर करने हेतु यह ”कालसर्पहर श्री पार्श्वनाथ विधान”’की रचना की है |
इस विधान में सर्वप्रथम मंगलाचरणकरते हुए पार्श्वनाथ भगवान का स्तोत्र हैं जिसमें पार्श्वनाथ का पूरा जीवन परिचय समाहित हैं स्तोत्र आदि के पश्चात सभी प्रकार के दुष्ट ग्रहों को दूर करने के लिए कलिकुंड पार्श्वनाथ भगवान की पूजा है |यह कालसर्पहर श्री पार्श्वनाथ विधान सभी दोषों को दूर करने वाला हैं |