प्रज्ञाश्रमण ऋद्धि!
[[श्रेणी:शब्दकोष]] प्रज्ञाश्रमण ऋद्धि – Pragyaashramana Riddhi. A type of supematural power related to sagacity. जिस ऋद्धि के प्रभाव से साधू विशेष अध्ययन के बिना भी समस्त शास्त्रों को सूक्ष्मतासे जानने में समर्थ होता है “
[[श्रेणी:शब्दकोष]] प्रज्ञाश्रमण ऋद्धि – Pragyaashramana Riddhi. A type of supematural power related to sagacity. जिस ऋद्धि के प्रभाव से साधू विशेष अध्ययन के बिना भी समस्त शास्त्रों को सूक्ष्मतासे जानने में समर्थ होता है “
[[श्रेणी:शब्दकोष]] संस्थान नामकर्म प्रकृति – Sansthaana Naamakarma Prakrti. Physique making Karma causing figure of the body. जिस कर्म के उदय से 6 प्रकार के संस्थानों में से कोई एक रूप शरीर का आकार हो “
[[श्रेणी:शब्दकोष]] सचित्त पूजा – Sachitta Poojaa. A type of worshipping of Lord Jinendra (in Samavasaran), Acharya (saints) etc. द्रव्यपूजा के 3 भेदों में एक भेद; प्रत्यक्ष उपस्थित जिनेन्द्र भगवान (समवशरण में) और गुरु आदि का यथायोग्य पूजन करना सचित्त पूजा है “
[[श्रेणी:शब्दकोष]] रूढी – परम्परागत, सर्वमान्य अर्थ अथवा लोक प्रसिद्ध। Rurhi-Old usage, Tradition, Convention
[[श्रेणी : शब्दकोष]] मनोज्ञान- Manogyana. Wisdom , mental knowledge , intelligence , Telephatic knowledge. मन के निमित से उत्पन्न होने वाला ज्ञान ” मनःपर्यय ज्ञान “
उद्दिष्टत्याग प्रतिमा The 11th Pratima (model stage) of renunciation of specific food. 11 वीं प्रतिमा जिसमे अपने निमित्त बनाये भोजन लेने का त्याग होता है।[[श्रेणी:शब्दकोष]]
[[श्रेणी :शब्दकोष]] मिश्रश्रद्धा–Mishrashraddha. To have right & wrong reverence or devotion. एक ही समय में तत्त्व और अतत्त्व दोनों पदार्थो की श्रद्धा होना” अर्थात् सम्यक मिथियात्व रूप मिला हुआ श्रद्धान”
[[श्रेणी:शब्दकोष]] भूषणांग जाति कल्प वृक्ष:A type of wish fulfilling tree (related to providing ornaments). 10 प्रकार के कल्प वृक्षों में एक वृक्ष का नाम; जोआभूषण प्रदान करतेहैं।
[[ श्रेणी:जैन_सूक्ति_भण्डार ]] [[ श्रेणी:शब्दकोष ]] == समानता : == म्रियतां वा जीवतु वा जीव:, अयताचारस्य निश्चित हिंसा। प्रयतस्य नास्ति बन्धो, हिंसामात्रेण समितिषु।। —समणसुत्त : ३८८ जीव मरे या जीये, अयतनाचारी को हिंसा का दोष अवश्य लगता है। किन्तु जो समितियों में प्रयत्नशील है, उससे बाह्य हिंसा हो जाने पर भी उसे कर्मबंध नहीं होता।…