युगकंधर!
[[श्रेणी:शब्दकोष]] युगकंधर – कायोत्सर्ग का एक अतिचार, कंधे झुकाते हुए खडे होना। Yugakamdhara-An infraction of meditative relaxation, mediation with down shoulders
[[श्रेणी:शब्दकोष]] युगकंधर – कायोत्सर्ग का एक अतिचार, कंधे झुकाते हुए खडे होना। Yugakamdhara-An infraction of meditative relaxation, mediation with down shoulders
[[श्रेणी:शब्दकोष]] सहस्रायुध – Sahasraayudha. The son of Chakravarti (emperor) Vajrayudh. चक्रवर्ती वज्रायुध का पुत्र । मुनि पिहितास्रव से दीक्षा लेकर सन्यासमरण कर अधोग्रैवेयक में अहमिन्द्र हुआ ।
[[श्रेणी:शब्दकोष]] रत्नावतंसिका – बलभद्र को प्राप्त चार महारत्नो में एक रत्न यह बलभद्र राम की माला का नाम है इसकी 1000 देव रक्षा करते है। Ratnavatamsika- One of the great Jewels of balbhadra, Ram a wreath
[[श्रेणी:शब्दकोष]] प्रभाचंद्र- इस नाम के अनेकों आचार्य हुए है। Prabhacandra- Name of many acharyas
[[श्रेणी:शब्दकोष]] लक्ष्मीमती – रूचक पर्वत निवासिनी दिक्कुमारी देवी, हस्तिनापुर केे राजा सोमप्रभ की रानी जयकुमार की माता, तीर्थकर चद्रप्रभ की माता लक्ष्मणा का अपरनात। Laksmimati-Name of presiding female divinity of ruchak mountain, The3 queen of the king Somprabh of hastinapur , another name of mother of Jaina lord Chandraprabh
[[श्रेणी:शब्दकोष]] सहस्रकीर्ति – Sahasarakeerti. Name of the preceptor of Nemichandra Bhattarak of Nandi group and a saint of Kashtha group. नंदिसंघ बलात्कारगण नागौर गद्दी के एक भट्टारक नेमिचन्द्र के गुरू, काष्ठासंघ पट्टावली के एक आचार्य त्रिभुवनकीर्ति के शिष्य ।
[[श्रेणी:शब्दकोष]] योग्य पात्र – जो सम्यग्दर्षन से षुद्ध है धर्मध्यान में लीन रहता है और सब तरह केे परिग्रह व मायादि षल्यों से रहित है। Yogya patra-Absolutely worthy saint
[[श्रेणी:शब्दकोष]] प्रायोपगमन मरण- समाधिमरण का उत्कृश्ट रुप; ऐसा समाधिकरण करना जिसमें न तो आप अपना इलाज करें न दूसरे से करवें प्रत्युत् ध्यान में लीन रहें। Prayapagamana Marana- Faultless voluntary great and holy death
[[श्रेणी:शब्दकोष]] योग्य क्षेत्र – पर्वत, गुहा, वृक्ष की कोटर , नदी का तट, नदी का पुल आदि समस्त ध्यान के योग्य स्थान। Yogya Ksetra-Suitable area or space for meditation
जिनसेन- आप आ0 भीमसेन के शिष्य तथा शांति सेन के गुरु थे समय ई.श. 7 अन्न । पुन्नाह संघ की मुर्वावली के अनुसार आप श्री कीर्तिषेण के शिष्य थे। कृति- हरिवंश पुराण वीरसेन स्वामी के शिष्य बागर्भ दिगम्बर। कृतिये-अपने गुरु की 20000 श्लोक प्रमाण अधुरी जयधवला टीका को 40000 श्लोक प्रमाण अपनी टीका द्वारा पूरा…