सरस्वती माता की आरती रचयित्री-प्रज्ञाश्रमणी आर्यिका चंदनामती तर्ज—झुमका गिरा रे......... आरति करो रे, जिनवाणी माता सरस्वती की आरति करो रे। द्वादशांगमय श्रुतदेवी का श्रेष्ठ तिलक सम्यग्दर्शन। वस्त्र धारतीं चारित के चौदह पूरब के आभूषण।। आरति करो, आरति करो, आरति करो रे, आकार सहित उन श्रुतदेवी की आरति करो रे।।१।। इनके आराधन से ज्ञानावरण...
सिद्धायिनी माता की आरती (इसमें किसी भी देवी का नाम लेकर उनकी आरती कर सकते हैं) तर्ज—लेके पहला पहला प्यार........... जय जय हे सिद्धायिनि मात, तेरे चरण नमाते माथ तेरी आरति से मिटता है जग संताप ।। तेरे भक्त खड़े तेरे द्वार, बिगड़े सभी बनातीं काज तेरी आरति से मिटता है जग संताप ।।टेक.।। महावीर...
सहस्रनाम विधान की आरती तर्ज—ॐ जय............. ॐ जय अन्तर्यामी, स्वामी जय अन्तर्यामी। सहस आठ गुणधारी, सिद्धिप्रिया स्वामी।।ॐ जय.।।टेक.।। निज में निज हेतू ही, निज को जन्म दिया। ...
सहस्रकूट जिनबिम्ब की आरती तर्ज—झुमका गिरा रे....... आरति करो रे, श्री सहस्रकूट के जिनबिम्बों की आरति करो रे। टेक.।। इनकी आरति जनम जनम के, पाप तिमिर को हरती है। पुण्य सूर्य की दिव्यप्रभा से, अन्तर कलियाँ खिलती हैं।। आरति करो, आरति करो, आरति करो रे, श्री सहस्रकूट के जिनबिम्बों की आरति करो रे।।१।। श्री...
हस्तिनापुर तीर्थ की आरती तर्ज—माई रे माई............. हस्तिनागपुर तीरथ की हम, आरति करने आए। आरति करते तीरथ की, निज अन्तर्मन खिल जाए।। बोलो जय जय जय-२, प्रभू की जय, जय, जय।।टेक.।। है इतिहास प्रसिद्ध तीर्थ यह, अतिप्राचीन सुपावन। इस भूमी का वन्दन कर लो, अद्भुत है मनभावन।। देवों द्वारा रची गई..... देवों द्वारा रची गई,...
भगवान श्री संभवनाथ की आरती-३ तर्ज—मैं तो आरती उतारूं रे........ मैं तो आरती उतारूं रे, सम्भव जिनेश्वर की, जय जय जिनेन्द्र प्रभु, जय जय जय-२।।टेक.।। इस युग के तृतीय प्रभू, तुम्हीं तो कहलाए, तुम्हीं...... पिता दृढ़रथ सुषेणा मात, पा तुम्हें हरषाए, पा......... अवधपुरी धन्य-धन्य, इन्द्रगण प्रसन्नमन, उत्सव मनाएं रे हो जन्म उत्सव मनाएँ रे।।मैं..............।।१।। मगशिर...
सिहपुरी तीर्थ की आरती तर्ज—जहाँ डाल-डाल पर............ श्री सिंहपुरी पावन तीरथ की आरति को हम आए। कंचन का थाल सजाएँ।।टेक.।। है पुण्य बड़ा जो तीर्थंकर प्रभु, जन्म धरा पर लेते। अपनी पावनता से वे जग भर, को पावन कर देते।। ...
समवसरण की आरती तर्ज—तन डोले...................... जय जय जिनवर के, समवसरण की, मंगल दीप प्रजाल के, मैं आज उतारूं आरतिया।। समवसरण के बीच प्रभू जी, नासादृष्टि विराजे। गणधर मुनि नरपति से शोभित, बारह सभा सुराजे।।प्रभू जी.......... ओंकार ध्वनि, सुन करके मुनि, रत रहें स्व पर कल्याण में, मैं आज उतारूं आरतिया।।१।। चार दिशा के मानस्तम्भों...
भगवान श्री श्रेयांसनाथ की आरती तर्ज—इह विधि मंगल आरति...... प्रभु श्रेयांस की आरति कीजे,भव-भव के पातक हर लीजे ।।टेक.।। स्वर्ण वर्णमय प्रभा निराली, मूर्ति तुम्हारी है मनहारी।। ...