सप्त नय!
[[श्रेणी:शब्दकोष]] सप्त नय – Sapta Naya. Seven kinds of standpoints. नैगम, संग्रह, व्यवहार, ऋजुसूत्र, शब्द, समभिरुढ़ व एवंभूत। इन सात नयांे मे प्रारंभिक तीन द्रव्यार्थिक नय तथा अंतिम चार पर्यायार्थिक नय कहलाते है।
[[श्रेणी:शब्दकोष]] सप्त नय – Sapta Naya. Seven kinds of standpoints. नैगम, संग्रह, व्यवहार, ऋजुसूत्र, शब्द, समभिरुढ़ व एवंभूत। इन सात नयांे मे प्रारंभिक तीन द्रव्यार्थिक नय तथा अंतिम चार पर्यायार्थिक नय कहलाते है।
[[श्रेणी:शब्दकोष]] शुद्धाशुद्धोपयोग – Shuddhashuddhopayoga. Passionless and passionful conduct. शुद्ध व अशुद्ध उपयोग का मिश्ररूप “
[[श्रेणी:शब्दकोष]] सन्मति – Sanmati. The other name of Lord Mahavira, Name of the 2nd Kulkar (ethical Founder). भगवान महावीर का अपरनाम, यह नाम पालने मे झूलते बालक वद्र्वमान को देखकर संजय और विजय नामक चारण ऋद्विधारियो ने अपना संदेह दूर होने पर रखा था। प्रतिश्रुति कुलकर का पुत्र दूसरा कुलकर। इन्होने प्रजा को ज्योतिष विघा…
गुणारोपण Imparting attributes – the ceremony of consec- ration of an idol. प्रतिष्ठा विधान की विधि का एक भेद ; प्रतिमा में गुणों का आरोपण करना ।[[श्रेणी:शब्दकोष]]
[[श्रेणी: शब्दकोष]] मंदरार्य: Name of the disciple of Acharya Arhadbali. आचार्य अर्हद्बबली के शिष्य तथा मित्र वीर के गुरु का नाम “
[[श्रेणी:शब्दकोष]] विडौषधि ऋद्धि –Vidaushadhi Riddhi.: A supernatural power-curing the diseases of beings with excreta of saints. जिसके प्रभाव से साधु का मल-मूत्र भी जीवों के रोगों को नष्ट करने में समर्थ होता है “
[[श्रेणी: शब्दकोष]] मंडित: Including, A city situated in the south of Vijayardh mountain. सहित, समन्वित, विजयार्ध की दक्षिण श्रेणी का एक नगर “
[[श्रेणी:शब्दकोष]] विजयद्वार – Vijayadvaara.: The east door of the rampart of Jambudvip (island). जम्बूद्वीप की जगती (कोट ) का पूर्व द्वार “
[[श्रेणी: शब्दकोष]] मंगल द्रव्य : Auspicious articles like fly-whisk, pitcher, parasol etc. जिन प्रतिमा के समीप रहने वाले अष्ट मंगल द्रव्य – पंखा, छत्र, चमर, ध्वजा, दर्पण, सुप्रतिष्ठ, भृंङार, कलशये 8 मुख्य रूप से मंगल द्रव्य हैं “
[[श्रेणी:शब्दकोष]] विचिकित्सा – Vichikitsaa.: Aversion,disgust,antipathy,hatred (a fault of right perception). ग्लानि ,घृणा “साधुओं को मलिन देखकर उनसे घृणा करना ” यह सम्यग्दर्शन का एक दोष है “