नेत्र (चक्षु इन्द्रिय)!
[[श्रेणी:शब्दकोष]] नेत्र (चक्षु इन्द्रिय) – Netra (Chakshu Indriya). Eyes. आँख, चक्षु (चौथी इंद्रिय) “
[[श्रेणी:शब्दकोष]] नेत्र (चक्षु इन्द्रिय) – Netra (Chakshu Indriya). Eyes. आँख, चक्षु (चौथी इंद्रिय) “
[[श्रेणी:शब्दकोष]] शिवादेवी – Shivaadevee. Mother’s name of Lord Neminath. भगवान नेमिनाथ की माता, महाराज समुद्रविजय की महारानी का नाम “
[[श्रेणी:शब्दकोष]] नीली – Neelee. Name of a lady famous for high moral character. प्रसिद्द पतिव्रता शीलवती स्त्री “
[[श्रेणी:शब्दकोष]] निचैर्वृत्त्ति – Nichairvritti. Politeness, Meekness. नम्र वृत्ति, नम्रता” जो गुणों में उत्कृष्ट है उनके प्रति विनय अथवा नम्रता से रहना “
[[श्रेणी:शब्दकोष]] शिव – Shiva. Name of the 13th Tirthankar (Jain-Lord) of past time, Name of a door of samavsharam(assembly of lord). भूतकालीन तेरहवें तीर्थंकर, समवशरण के तीसरे कोट के दक्षिण द्वार का नाम “
[[श्रेणी : शब्दकोष]] भग्नघट श्रोता – Bhgnaghata Srota. A type of false listener. अपात्र श्रोता का एक भेद; फूटे घड़े की तरह होना जिसमें उपदेश नहीं ठहरता “
[[ श्रेणी:जैन_सूक्ति_भण्डार ]] [[ श्रेणी:शब्दकोष ]] == धर्मास्तिकाय : == धर्मास्तिकायोऽरतो—ऽवर्णगन्धोऽशब्दोऽस्पर्श:। लोकावगाढ: स्पृष्ट:, पृथुलोऽसंख्यातिकप्रदेश:।। —समणसुत्त : ६३१ धर्मास्तिकाय रसरहित है, रूपरहित है, गंधरहित है और शब्दरहित है। समस्त लोकाकाश में व्याप्त है, अखण्ड है और विशाल है तथा असंख्यातप्रदेशी है। उदकम् यथा मत्स्यानां, गमनानुनुग्रहकरं भवति लोके। तथा जीवपुद्गलानां, धर्मद्रव्यं विजानीहि। —समणसुत्त : ६३२ जैसे इस…
[[श्रेणी:शब्दकोष]] वचन प्रत्याख्यान – Vachan Pratyaakhyaana.: Utterance for not repeating something wrong. प्रत्याख्यान (त्याग) का एक भेद; में भविष्य में अपने व्रतों में अतिचार नहीं लगाऊंगा ऐसा बोलना “
[[श्रेणी:शब्दकोष]] निष्प्राण – Nishpraana. Lifeless. निर्जीव अर्थात् जिसमें प्राण न हो “
[[श्रेणी:शब्दकोष]] संव्यवहरण दोष – Sanvyavaharana Dosha. A fault related to saint food, careless activities in offering food to saint. श्रावक के निमित्त से होने वाला जैन साधुओं के आहार का एक दोष ” साधु को आहार देने के लिए बर्तन आदि को शीघ्रता से बिना देखे उठाना संव्यवहरण दोष है “