परंपरा आगम!
[[श्रेणी: शब्दकोष]] परंपरा आगम:Scriptures as stated by Gandhar (Chief disciple of Lord) etc. गणधरादि द्वारा कथिम आगम ।
[[श्रेणी: शब्दकोष]] परंपरा आगम:Scriptures as stated by Gandhar (Chief disciple of Lord) etc. गणधरादि द्वारा कथिम आगम ।
[[श्रेणी:शब्दकोष]] वर्द्धमानसागर (मुनि) – Varddhamaanasagar (Muni). Name of a Digamber Jain saint, the disciple of Charitra Chakravarti Acharya Shri Shantisagar ji Maharaj and the elder brother of his house hold life. चारित्र चक्रवर्ती आचार्य श्री शान्तिसागर जी महाराज के गृहस्थावस्था के बड़े भाई ,जिन्हें अत्यंत पुरुषार्थपूर्वक आचार्य श्री ने घर से निकालकर मुनिदीक्षा प्रदान कर…
[[श्रेणी:शब्दकोष]] पंचचारित्र सिद्ध – Panchachaaritra Siddha. Beings salvated due to five kinds of right conducts (in accordance with Bhutpragyapan Naya). भूतप्रज्ञापन नय की अपेक्षा पंच चारित्र से सिद्ध होने वाले जीव “
[[श्रेणी: शब्दकोष]] पनसा:A river of Bharat Kshetra Arya Khand (region). भरत क्षेत्र स्थित आर्यखण्ड की एक नदी ।
[[ श्रेणी:जैन_सूक्ति_भण्डार ]] [[ श्रेणी:शब्दकोष ]] == सद्भाव : == किं तेणावि घडिज्जइ जो न हु सब्भावरसनिसित्तो वि। पुरिसो य पुहइिंपगे व मिज्जिओ अप्पमप्पेइ। —गाहारयणकोष : ६५ जो सद्भाव के रस से अभिसिंचित नहीं है, उसके जन्म से क्या लाभ ? पुरुष तो पृथ्वी के िंपड जैसा होता है जो पानी से भीजकर अपने आपको…
[[श्रेणी : शब्दकोष]] विवाहिता स्त्री – Vivahita Stri. Married Woman, accepted ritually. देवशास्त्रगुरु को नमस्कार कर तथा अपने भाई – बन्धुओं की साक्षीपूर्वक जिस कन्या के साथ विवाह किया जाता है वह विवाह स्त्री कहलाती है “
[[श्रेणी : शब्दकोष]] भाव मार्गणा – Bhava Margana. Psychical investigation. जिन भावों के द्वारा जीवों का अन्वेषण किया जाता है “
[[श्रेणी : शब्दकोष]] भंगविधि – Bhamgavidhi. A particular method for obtaining knowledge of something, synonym word for shrutgvan (scrip- tural knowledge). अहिंसा, सत्य, अस्तेय, शील आदि भंग का जिसके द्वारा विधान किया जाता है उसे भंगविधि अर्थात् श्रुतज्ञान कहते हैं “
[[ श्रेणी:जैन_सूक्ति_भण्डार ]] [[ श्रेणी:शब्दकोष ]] == शौच : == समसंतोसजलेणं जो धोवदि तिव्व—लोहमल—पुंजं। भोयण—गिद्धि—विहीणो, तस्स सउच्चं हवे विमलं।। —समणसुत्त : १०० समता और संतोष के जल से जो तीव्र लोभ के मल—पुंज को धाया करता है, भोजन की लालसा से जो विहीन हुआ करता है, वह पवित्र शौच धर्म से संपन्न होता है।