श्राविका!
[[श्रेणी:शब्दकोष]] श्राविका – Shraavikaa. A female lay follower of Jaina instructions. जो गृहस्थ महिला श्रद्धावान, विवेकवान व सदाचारी हो एवं धर्म का अनुसरण करती हो “
[[श्रेणी:शब्दकोष]] श्राविका – Shraavikaa. A female lay follower of Jaina instructions. जो गृहस्थ महिला श्रद्धावान, विवेकवान व सदाचारी हो एवं धर्म का अनुसरण करती हो “
[[श्रेणी:शब्दकोष]] पद्मनंदि पंचविंषतिका : A book written by Acharya Padmanandi. आचार्य पदमनन्दि (ई0 11 का उत्तरार्ध) द्वारा संस्कृत छंदों में रचित गृहस्थ धर्म प्ररूपक एक ग्रन्थ । इस ग्रंथ के स्वाध्याय से गणिनी श्री ज्ञानमती माताजी को गृहस्थवस्था में अल्पआयु।
[[श्रेणी : शब्दकोष]] विद्युत्प्रभ – Vidyutprabha. One of the 4 Gajadant mountains, A city of vijayardh mountain. ४ गजदंत पर्वतों में एक गजदंत पर्वत, विजयार्ध पर्वत का एक नगर “
[[ श्रेणी:जैन_सूक्ति_भण्डार ]] [[ श्रेणी:शब्दकोष ]] == वीतराग : == यत्सुखं वीतरागस्य मुने: प्रशमपूर्वकम्। न तस्यानन्तभागोऽपि प्राप्यते त्रिदशेश्वरै:।। —ज्ञानार्णव : १९-३ वीतराग मुनि को प्रशम भाव सहित जो सुख प्राप्त होता है, उसका अनन्तवां भाग भी देवेन्द्रों को प्राप्त नहीं होता (अर्थात् इन्द्र के प्राप्त होने वाले सुख से अनंतगुना—अक्षय सुख वीतराग मुनि को प्राप्त…
[[श्रेणी: शब्दकोष]] पदार्थ श्रद्धान: Real & right belief in all 9 mattars सम्यग्दर्शन हिंसादि रहित धर्म, अठारह दोष रहित आप्त, निग्र्रन्थ प्रवचन व गुरू में श्रद्धान रखना । 9 पदार्थो के यथार्थ श्रद्धान से सम्यग्दर्षन होता है।
[[ श्रेणी:जैन_सूक्ति_भण्डार ]] [[ श्रेणी:शब्दकोष ]] == गुणस्थान : == यैस्तु लक्ष्यन्ते, उदयादिषु सम्भवैर्भावै:। जीवास्ते गुणसंज्ञा निर्दिष्टा: सर्वर्दिशभि:।। मिथ्यात्वं सास्वादन: मिश्र:, अविरतसम्यक्त्व च देशविरतश्च। विरत: प्रमत्त: इतर: अपूर्व: अनिवृत्ति: सूक्ष्मश्च।। उपशान्त: क्षीणमोह: संयोगिकेवलिजिन: अयोगी च। चतुर्दश गुणस्थानानि च, क्रमेण सिद्ध: च ज्ञातव्या।। —समणसुत्त : ५४६-५४८ मोहनीय आदि कर्मों के उदय आदि (उपशम, क्षय, क्षयोपशम आदि)…
[[श्रेणी:शब्दकोष]] श्रद्धान प्रायश्चित – Shraddhaana Praayashchita. Repentance over false belief with acceptance of right belief. मिथ्यात्व को प्राप्त होकर स्थित हुए जीव के महाव्रतों को स्वीकार कर आप्त, आगम और पदार्थों का श्रद्धान करने पर श्रद्धान नाम का प्रायश्चित होता है “
[[श्रेणी: शब्दकोष]] पदधन: Sum of progression. सर्वधन, अगल-अलग पदों को जोडने पर प्राप्त प्रमाण ।
[[श्रेणी : शब्दकोष]] वीर ज्ञानोदय ग्रंथमाला –ViraJnanodayaGrarnthamala Name of alarge Jain Granthmala(publishing centre)established in the year 1972 on the inspiration of GaniniShriGyanmatiMataji at Jambudvip – Hastinapur (Meerut). U.P. it is managed by ‘Digambar Jain TrilokShodhSansthan’ and nuber of jain treatises have been published and are being published form here. See the list of its all…