पन्नालाल!
[[श्रेणी: शब्दकोष]] पन्नालाल:A Pandit who wrote number of books. एक पंडित (ई0 1770-1840), उत्तरपुराण व राजवार्तिक की भाषा वचनिकाओं तथा विद्वद्जन बोधक आदि के कर्ता ।
[[श्रेणी: शब्दकोष]] पन्नालाल:A Pandit who wrote number of books. एक पंडित (ई0 1770-1840), उत्तरपुराण व राजवार्तिक की भाषा वचनिकाओं तथा विद्वद्जन बोधक आदि के कर्ता ।
[[ श्रेणी:जैन_सूक्ति_भण्डार ]] [[ श्रेणी:शब्दकोष ]] == निर्जरा : == बंधपदेशग्गलणं निज्जरणं इदि जिणेहिं पण्णत्तं। जेण हवे संवरणं तेण दुणिज्जरणमिदि जाणे।। —वारस अणुवेसवा : ६६ बंधे हुए कर्म—प्रदेशों के क्षरण को निर्जरा कहा जाता है। जिन कारणों से संवर होता है, उन्हीं कारणों से निर्जरा होती है। यथा महातडागस्य, सन्निरुद्धे जलागमे। उत्सिंचनया तपनया, क्रमेण शोषणा…
[[श्रेणी :शब्दकोष]] यथाच्छंद श्रोता–Yathachchhand Shrota. Self–willed type of listener. श्रोता का एक प्रकार” स्वच्छंद प्रवत्ति करने वाला श्रोता जिसे विद्या देना संसार व भय को ही बढ़ाना है”
[[श्रेणी : शब्दकोष]] भगवती आराधना – Bhagavati Aradhana. Name of a book written by Achrya Shivakoti. आचार्य शिवकोटि (ई,श. १ ) कृत एक ग्रंथ ” इसमें जैन साधुओं की चर्या एंव सल्लेखना विधि का विस्तार से वर्णन है “
[[ श्रेणी:जैन_सूक्ति_भण्डार ]] [[ श्रेणी:शब्दकोष ]] == जीवात्मा : == ववहारणयो भासदि, जीवो देहो य हवदि खलु इक्को। ण दु णिच्छयस्स जीवो, देहो य कदापि एकट्ठो।। —समयसार : २७ व्यवहार दृष्टि (नय) से जीव (आत्मा) और देह एक प्रतीत होते हैं किन्तु निश्चय दृष्टि से दोनों भिन्न हैं, कदापि एक नहीं।
[[श्रेणी:शब्दकोष]] सूक्ष्म सूक्ष्म स्कंध – Sukshma Sukshma Skandha. Aggregate of two particles of a matter. पुदगल के मात्र दो परमाणु रूप स्कंध को सूक्ष्म सूक्ष्म स्कंध कहते है।
[[श्रेणी : शब्दकोष]] विध्दण (कवि) – Viddhanu (Kavi). Name of a poet. ज्ञानपंचमी अर्थात् श्रुत पंचमीव्रत माहात्म्य नामक भाषा छंद रचना के कर्ता एक कवि ” समय –वि. सं. १४२३ “
[[श्रेणी: शब्दकोष]] पद्मसुन्दर :A disciple of Pandit Padmameru who wrote a book ‘Bhavishyadattacharit’. पंडित पद्ममेरू के शिष्य एवं भविष्यदत्त चरित के रचयिता ।
[[ श्रेणी:जैन_सूक्ति_भण्डार ]] [[ श्रेणी:शब्दकोष ]] == चोरी : == गुणा गौणत्वमायाति याति विद्या विडम्बनाम्। चौर्येणाकीर्तय: पुंसां शिरस्यादधते पदम्।। —ज्ञानार्णव : १२८ चोरी करने से गुण छुप जाते हैं, विद्या निकम्मी हो जाती है और बदनामी सिर पर चढ़कर बोलती है।