देशजिन!
देशजिन The Jaina saints possessing high spiritual knowledge. आचार्य, उपाध्याय, साधु देशजिन कहलाते हैं क्योंकि सकलजिनों के समान देशजिन में भी तीन रतन पाये जाते हैं। [[श्रेणी: शब्दकोष ]]
देशजिन The Jaina saints possessing high spiritual knowledge. आचार्य, उपाध्याय, साधु देशजिन कहलाते हैं क्योंकि सकलजिनों के समान देशजिन में भी तीन रतन पाये जाते हैं। [[श्रेणी: शब्दकोष ]]
[[श्रेणी: शब्दकोष]]हंससम श्रोता – Hammsasama Srotaa. The right listeners, accepting meaningful thoughts. श्रोता के 14 भेदो मे एक भेद। जो केवल सार वस्तु को ग्रहण करते है, वे हंस के समान श्रोता है।
[[श्रेणी: शब्दकोष]] पर निंदा:Defamation of others; slander, Censuring others.नीच गोत्र के आस्त्रव का कारण, दूसरों की बुराई करना ।
[[श्रेणी : शब्दकोष]] भाव (सचित्त , अचित्त , मिश्र ) – Bhava(Sachitta, Achitta, Mishra). Reflections. जीव द्रव्य सचित भाव है , पुदगल आदि ५ द्रव्य अचित भाव हैं एंव पुदगल और जीव द्रव्यों का संयोग मिश्र भाव है “
[[श्रेणी: शब्दकोष]]स्वार्थनुमान – Svaarthaanumaana. Subjective inference (caused by perception of some means). अनुमान के दो भेदो मे एक भेद। परोपदेष के अभाव मे भी केवल साधन से साध्य को जानकर जो ज्ञान देखने वाले को उत्पन्न हो जाता है उसे स्वार्थनुमान कहते है। जैसे धुएॅ को देखकर अग्नि का अनुमान लगा लेना।
[[ श्रेणी:जैन_सूक्ति_भण्डार ]] [[श्रेणी:शब्दकोष ]] == गुप्ति : == संरम्भे समारम्भे, आरम्भे च तथैव च। वच: प्रवर्तमानं तु, निवर्तयेद् यतं यति:।। —समणसुत्त : ४१३ यतना—सम्पन्न यति संरम्भ, समारम्भ व आरम्भ में प्रवत्र्तमान वचन को रोके—उसका गोपन करे। क्षेत्रस्य वृत्तिर्नगरस्य, खातिकाऽथवा भवति प्राकारा:। तथा पापस्य निरोध:, ता: गुप्तय: साधो:।। —समणसुत्त : ४१५ जैसे खेत की रक्षा…
[[श्रेणी: शब्दकोष]]स्वाधीन – Svaadhiina. Self dependent. स्वतंत्र, आत्माधीनं। सिद्वो का सुख संसार के विषयो से अतीत स्वाधीन अव्यय होता है।
[[श्रेणी:शब्दकोष]] सांसारिक सुख – Saansaarika Sukha. Worldly sensual pleasures. लौकिक या इन्द्रियजन्य सुख। यह सारा इन्द्रिय विषयक माना जाता है इसलिए यह केवल सुखाभास ही नही, किन्तु निःसंदेह दुखरुप ही हैं।
[[श्रेणी:शब्दकोष]] सहानवस्था विरोध – Sahaanvasthaa Virodha. Mutual opposition in the different states of a matter. विरोध के तीन भेदों में एक भेद । यह विरोध एक वस्तु की क्रम से होने वाली दो प्र्यायों में होता है। नयी पर्याय उत्पन्न होती है तो पूर्व पर्याय नष्ट हो जाती है।