विशालप्रभ!
[[श्रेणी : शब्दकोष]] विशालप्रभ – Vishalaprabha. Name of the 10th Jaina – Lord of Videh Kshetra (region). विदेह क्षेत्र के १० वें तीर्थकर का नाम “
[[श्रेणी : शब्दकोष]] विशालप्रभ – Vishalaprabha. Name of the 10th Jaina – Lord of Videh Kshetra (region). विदेह क्षेत्र के १० वें तीर्थकर का नाम “
[[श्रेणी:शब्दकोष]] निश्चय अनशन – Nishchaya Anasana. Absolute fasting with conquering the worldly desires. मुनि अवस्था में विषय सुख की अपेक्षा न करते हुए अर्थात् मन व इंद्रियों को जीतते हुए आत्मसुख में ही निवास करना”
[[श्रेणी :शब्दकोष]] मैथुन संज्ञा– Maithun Sangya. Sex instinct. 4 संज्ञाओ में एक संज्ञा; मैथुनरूप क्रियाओ में होने वाली इच्छा”
[[श्रेणी:शब्दकोष]] शलाका पुरुष – Shalaakaa Purush. Particular 63 great personages like Tirthankar (Jaina-Lord), Chakarvarti (emperor) etc. in Jaina realm. तीर्थंकर, चक्रवर्ती आदि प्रसिद्द पुरुषों को शलाका पुरुष कहते है ” प्रत्येक कल्पकाल में ये 63 होते हैं ” 24 तीर्थंकर, 12 चक्रवर्ती, 9 नारायण, 9 प्रतिनारायण, 9 बलभद्र “
[[श्रेणी : शब्दकोष]] ब्रह्मर्षि – Brahmarsi. Saints having supernatural knowledge (pertain- ing to wisdom and medicines), Another name of Laukantik deities. बुद्धि और औषधि ऋध्दियुक्त साधु ब्रह्मर्षि कहलाते हैं , लौकांतिक देवों को भी ब्रह्मर्षि कहते हैं “
[[श्रेणी:शब्दकोष]] लोभ दोष –Lobha Dosh A fault related to saint –food talking (showing greed by the saints). यदि साधु लोग प्रगट करके आहार प्राप्त करे तो यह लोभ नाम का दोष है “
[[श्रेणी : शब्दकोष]] ब्रह्मदत्त – Brahmadatta. Name of the 12th Chakravarti. १२ वें चक्रवतीं का नाम, जो मरकर ७ वें नरक गये “
[[श्रेणी:जैन_सूक्ति_भण्डार ]] [[श्रेणी:शब्दकोष]] == कायक्लेश : == सुखेन भावितं ज्ञाने, दु:खे जाते विनश्यति। तस्मात् यथाबलं योगी, आत्मानं दु:खै: भावयेत्।। —समणसुत्त : ४५३ सुखपूर्वक प्राप्त किया हुआ ज्ञान दु:ख के आने पर नष्ट हो जाता है। अत: योगी को अपनी शक्ति के अनुसार दु:खों के द्वारा अर्थात् कायक्लेशपूर्वक आत्म-चिन्तन करना चाहिए।
[[श्रेणी:शब्दकोष]] नंदिमित्र – Namdimitra Name of the predestined 2nd Narayan, the 7th Balbhadra, the 82nd chief disciple (Gandhar) of Lord Rishabhdev, Name of a great saint possessing knowledge of 14 Purvas. आगामी दुसरे नारायण, सातवे बलभद्र. वृषभदेव के 82 वें गणधर, पांच श्रुत्केवली मुनियों में 14 पूर्व के ज्ञाता दुसरे मुनि का नाम ”
आहारक काय योग Vibration in soul-points while translocation of Aharak Sharir. आहारक शरीर के काम करते हुए जो आत्मा के प्रदेश सकंप होते हैं उसे आहारक काय योग कहते हैं।[[श्रेणी:शब्दकोष]]