भागाभाग!
[[श्रेणी : शब्दकोष]] भागाभाग – Bhagabhaga. Divided divisions. कुल द्रव्यों का भाग करने पर, कितना भाग किसके हिस्से में आता है, इसे भागाभाग कहते हैं “
[[श्रेणी : शब्दकोष]] भागाभाग – Bhagabhaga. Divided divisions. कुल द्रव्यों का भाग करने पर, कितना भाग किसके हिस्से में आता है, इसे भागाभाग कहते हैं “
[[श्रेणी:शब्दकोष]] सुर्यप्रज्ञप्ति – Suryapragyaapti. A part of scriptural knowledge containin description about the Sun (reg. its age, movement, family etc.) अंगश्रुत का एक भेद । दृष्टिवाद के प्रथम भेद परिकर्म में 5 प्रज्ञप्तियों का वर्णन है, उसमे यह दूसरी प्रज्ञप्ति है। इसमें 5 लाख 3 हजार पदो के द्वारा सूर्य की आयु, परिवार, वैभव, गति…
[[श्रेणी:शब्दकोष]] पंच अनुमानावयव – Pancha Anumaanaavayava. Five elements of apprehensive sentences. प्रतिज्ञा, हेतु, उदाहारण, उपनय और निगमन ये अनुमान वाक्य के पंच अवयव है “
[[श्रेणी : शब्दकोष]] भाव (सचित्त , अचित्त , मिश्र ) – Bhava(Sachitta, Achitta, Mishra). Reflections. जीव द्रव्य सचित भाव है , पुदगल आदि ५ द्रव्य अचित भाव हैं एंव पुदगल और जीव द्रव्यों का संयोग मिश्र भाव है “
[[श्रेणी:शब्दकोष]] सूरकीर्ति – Soorakeertee. Name of Bhattarak of Nandi group. न्ंदिसंघ बलात्कारगण वारां गद्दी के एक भट्टारक भावनंदि के शिष्य , विद्याचन्द्र के गुरू । समय वि0सं0 1167 ।
[[श्रेणी:शब्दकोष]] पंकप्रभा – Pankaprabhaa. That (4th) earth which has the colour of clay or mud. चतुर्थ नरक भूमि; जिसकी प्रभा कीचड़ के समान है “
[[ श्रेणी:जैन_सूक्ति_भण्डार ]] [[श्रेणी:शब्दकोष ]] == गुप्ति : == संरम्भे समारम्भे, आरम्भे च तथैव च। वच: प्रवर्तमानं तु, निवर्तयेद् यतं यति:।। —समणसुत्त : ४१३ यतना—सम्पन्न यति संरम्भ, समारम्भ व आरम्भ में प्रवत्र्तमान वचन को रोके—उसका गोपन करे। क्षेत्रस्य वृत्तिर्नगरस्य, खातिकाऽथवा भवति प्राकारा:। तथा पापस्य निरोध:, ता: गुप्तय: साधो:।। —समणसुत्त : ४१५ जैसे खेत की रक्षा…
[[श्रेणी : शब्दकोष]] भाजनांग जातीय कल्पवृक्ष – Bhajanamga Jatiya Kalpavrksa. A type of wish fulfilling trees (providing uten-sils). भोगभूमि में पाये जाने वाले १० कल्पवृक्षों में एक, यह कल्पवृक्ष सुवर्ण एंव बहुत से रत्नों से निमित धवल झारी, कलश, गागर आदि बर्तन प्रदान करने वाला होता है “
[[श्रेणी:शब्दकोष]] पिहितास्त्रव – Pihitasrava. Name of the father of Tirthankar (Jaina- Lord) Padmaprabh- Suparshvanath in past birth, Name of a Digambar Acharya. तीर्थंकर पद्मप्रभ, सुपार्श्वनाथ के पूर्व भाव के पिता, एक दिगाम्बराचार्य “
[[श्रेणी:शब्दकोष]] सूक्ष्मसाम्पराय संयम – Sukshmasaamparaaya Sanyama. Restraints with minute greediness. मोहकर्म का उपशमन या क्षपण करते हुए सूक्ष्म लोभ का वेदन करना सूक्ष्मसांपराय संयम हैं और धारक महामुनि सूक्ष्मसांपराय संयत कहलाते है।